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भारतीय इतिहास और आरोप प्रत्यारोप का दौर

भारतीय इतिहास और आरोप प्रत्यारोप का दौर - डॉ सचिन प्रताप सिंह

भारत सरकार में एक गृह मंत्री हुआ करते थे उनकी बेटी का आतंकवादियों ने “अपहरण” कर लिया था, बदले में  कई आतंकियों की रिहाई की माँग की गयी थी ,तत्कालीन लोकतांत्रिक राजा ने एक बेटी को बचाने के बदले में 13 आतंकियों को रिहा कर दिया था, अपनी प्रजा के लिए अपनी बेटी की क़ुर्बानी नहीं दे पाए।

इसके बाद कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की हज़ारों बहन बेटियों का उन्हीं आतंकी सरगनाओं द्वारा ना सिर्फ़ अपहरण हुआ बल्कि वो वीभत्स दुराचार हुए जिसके बारे में सोच कर भी रूह कांप उठ जाति है, आज लोग कहते हैं कि काश वो 13 आतंकी ना छोड़े गए होते तो इतनी बहन बेटियाँ हैवानियत की शिकार ना बनतीं।

ऐसा ही कुछ मध्यकालीन युग में भी हुआ था, सन 1200 के बाद जब हिंद पर विदेशी आक्रमण तेज हुए तो हर एक राजा लड़ा और ना जाने कितनों के कुल का समूल नाश हुआ ,पुरुष मिटे तो बच्चे लड़े। युद्ध के बाद होता ये था कि, पुरुष तो युद्ध में मारे जाते थे लेकिन महिलाएँ बच जाती थीं, तब महिलाओं के पास केवल एक विकल्प बचता था – जौहर, क्यूँकि जीवित रहने पर वो या तो हैवानियत का शिकार बनती थीं या फिर बग़दाद/दमिशक/कहिरा की मंडियों में बेच दी जाती।

सन 1200 के आस पास ऐसी अनेक घटनाओं का ज़िक्र है जब हिंदू राजा युद्ध हारे तो पुरुषों को कटवा दिया गया या धर्म परिवर्तन करा दिया गया और स्त्रियों के साथ दुराचार हुए और बाद में बग़दाद की मंडियों में उन्हें बेच दिया गया।

इस वीभत्स कृत्य के कई वर्षों के बाद पुनः विदेशी (तुर्क) मुग़ल आक्रमण हुए तब भी ये राजा लड़ते रहे, कहा जाता है कि कई हिंदू राजाओं के सामने मल्लेछ विधर्मियों ने संधि का प्रस्ताव भेजा, कुछ राजाओं के सामने धन का प्रस्ताव रखा, कुछ राजाओं के सामने अपनी घृणित मानसिकता का परिचय देते हुए बेटी से वैवाहिक समबंध का प्रस्ताव रखा गया। 

इन राजाओं के पास 2 ही विकल्प थे या तो उनकी माँग मानें या फिर युद्ध करें, कुछ राजाओं के पास तो युद्ध का विकल्प था ही नहीं, क्यूँकि सैकड़ों वर्षों तक युद्ध करने के कारण उनकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी।और वो कहा जाता है ना की इतिहास से सबक़ लेना चाहिए, तो जब उन्होंने इतिहास में देखा कि युद्ध हारने के बाद प्रजा बहन बेटियों के साथ क्या होता है तो उन्होंने युद्ध कुछ समय के लिए टालना ही उचित समझा। एक राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा है, उन्होंने प्रजा की रक्षा हेतु अपनी लाखों बहन बेटियों की रक्षा हेतु अपनी एक बेटी का वैवाहिक सम्बंध करना ही उचित समझा, अपनी प्रजा की रक्षा हेतु लाखों बहन बेटीयों की इज्जत बचाने हेतु अपनी एक बेटी को क़ुर्बान करना उचित समझा। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि, वो एक बेटी नाजायज़ बेटी थी ,बेटी जायज़ हो या नाजायज़ बेटी बेटी है एक पिता के लिए।

अगर लाखों बेटियों के साथ बलात्कार हों ,या उन्हें मंडियों में बेचा जाए तो बेहतर है कि उन्हें बचाने के लिए राजा एक बेटी का वैवाहिक संबंध अल्पकालिक संधि के रूप में कर दे , लाखों के अपहरण बलात्कार से बेहतर है एक त्यागपूर्ण संधि है।यह बलिदान किसी के लिए भी कर पाना असम्भव है , आज कल आरोप लगाना आसान है फ़लाँ राजा ने ये कर दिया वो कर दिया लेकिन वो लोग उस परिस्थिति में खुद को रख कर देखें राजा के लिए प्रजा की रक्षा सर्वोपरि कार्य है, एक सम्मान जनक संधि सम्बंध से लाखों की इज्जत बचती है तो बचानी चाहिए।

 कुछ लोगों का कहना है कि फ़लाँ राजा तो लड़े थे तो फ़लाँ क्यूँ नहीं तो उन लोगों को थोड़ा उन राजाओं के राज्य की भोगोलिक , आर्थिक और सैन्य क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए, और ऐसा भी नहीं था कि समझौते किए समझौते के बाद जब भी अनुकूल परिस्थिति तो प्रतिकार भी किया। (जैसे राम सिंह द्वारा छत्रपति शिवाजी का आगरा से निकलने में मद्द करना)

 वामपंथी इतिहासकारों ने आप के गौरवशाली इतिहास में जो छेड़छाड़ की है वो सर्वविदित है , इन इतिहासकारों ने आपको अपने ही पूर्वजों के बारे में ग़लत धारणा बनाने को मजबूर किया, ऐतिहासिक तत्वों को तोड़ मरोड़ के पेश किया ताकि आप हमेशा आरोप प्रत्यारोप में लगे रहो कभी एक ना हो पाएँ।

 हमें समझना होगा तब की परिस्थितियों के अनुसार, जो लोग एक दूसरे हिंदू भाइयों पर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं उन्हें इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता है उन्हें ये जानना चाहिए कि वीरता के साथ युद्ध हारने पर कैसे लाखों बहन बेटियों के साथ दुराचार होते थे। 

 उन्हें पढ़ना चाहिए कि पानीपत के युद्ध में अब्दाली के ख़िलाफ़ हिंदू मराठे वीरता से लड़ते हुए भी उस युद्ध को हार गए तो उसके बाद कितनी बहन बेटियों से दुराचार हुआ, बेहतर है ये आरोप प्रत्यारोप का दौर ख़त्म हो और इतिहास से सबक़ लेते हुए एक बेहतर समाज का निर्माण हो । 

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