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स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती एवं स्वामी दयानंद सरस्वती का शास्त्रार्थ

स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती एवं स्वामी दयानंद सरस्वती का शास्त्रार्थ

काशी में हुऐ कुछ ऐतिहासिक शास्त्रार्थ :~

“वादे-वादे जायते तत्वबोधः”

प्राचीनकाल से ही काशी में प्रतिदिन शास्त्रसभा का आयोजन होता था।सभा में विराजमान शास्त्रमहारथी पहले शास्त्रार्थ करते थे तत्पश्चात् दक्षिणा ग्रहण करते थे।नागपञ्चमी के दिन काशी के नागकुआँ पर शास्त्रज्ञों तथा छात्रों में शास्त्रार्थ करने की परम्परा वर्तमान में भी है।
वर्तमान में भी विवाह के अवसर पर कन्या और वर पक्ष के विद्वान् परस्पर विविधोपयोगी प्रमेयों पर शास्त्रार्थ करते हैं।अब इस परम्परा का ह्रास होने लगा है।काशी चूँकि व्याकरणशास्त्र की अध्ययनस्थली तथा महर्षि पतञ्जलि की कर्मस्थली होने के कारण शास्त्रविषयक उहापोह के लिए पुरातनकाल से ही जानी जाती है।
विद्वानों की क्रीडास्थली काशी में वर्षों से ऐतिहासिक शास्त्रार्थ सम्पन्न हुऐ है।कुछेक शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध भी किया गया है परन्तु अधिकांश प्रसिद्ध शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध ही नहीं किया गया है।

‘वैयाकरण केशरी महामहोपाध्याय पण्डित दामोदर शास्त्री’ तथा मैथिल विद्वत्वरेण्य ‘पण्डित बच्चा झा’ के मध्य जो अद्भुत् शास्त्रार्थ हुआ था उस अद्वितीय शास्त्रार्थ ने इतिहास में स्थान पा लिया है।
इस गम्भीर शास्त्रार्थ को देखने के लिए विद्वानों के अतिरिक्त हजारों की संख्या में साधारण जनता भी सम्मिलित हुई थी।

एतदतिरिक्त काशी के उद्भट् विद्वान् ‘महामहोपाध्याय पण्डित गङ्गाधर शास्त्री’ तथा वल्लभसम्प्रदाय के प्रसिद्ध पण्डित प्रज्ञाचक्षु ‘श्रीगट्टूलालजी’ से गोपालमन्दिर में जो प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ वह भी इतिहास का विषय बन गया है।इस शास्त्रार्थ में पं• गङ्गाधर जी को विजयश्री प्राप्त हुई थी।
आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से काशी के अनेक विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ था।किन्तु यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि दयानंद सरस्वती को प्रत्येक शास्त्रार्थ में पराजय स्वीकार करनी पड़ी थी भले ही आर्यसमाज के अनुयायी इस सत्य को स्वीकार न करें।
काशी के ‘पंडित बालशास्त्री’ जो अपने वैदुष्य से बलात् सभी को मोहित कर लेते थे इनके साथ दयानंद सरस्वती का एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था।इस शास्त्रार्थ में पं• बालशास्त्री जी ने दयानंद सरस्वती के ‘दम्भ’ को खण्ड-खण्ड किया था।इस शास्त्रार्थ में दयानंद सरस्वती ने काशी के सभी विद्वानों और अपने अनुयायियों के मध्य अपनी पराजय स्वीकार की थी।

१९वीं शती में ‘स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती’ जी ने अपने अलौकिक अगाध वैदुष्य से विद्यानगरी वाराणसी को अलंकृत किया था।महाराज ने अपनी शास्त्रीय शेमुषी तथा योगविद्या के प्रभाव से काशी के इतिहास में अपना नाम अंकित करवाया है।
इनका जन्म कान्यकुब्ज ब्राह्मणकुल में १७२० शाके(१८२०ई•)में हुआ था।इन महायोगी का प्रभाव सार्वभौम था।उत्तर भारत के राजा-महाराजा इनके पाद्पद्मों में लोट-पोट होकर स्वयं को धन्यातिधन्य अनुभव करते थे।सरस्वती और लक्ष्मी का नैसर्गिक विरोध इनके समक्ष शान्त हो गया था।
काशीनरेश प्रभु नारायणसिंह इनके अनन्य सेवक थे।प्रण्डितप्रवर ‘दुःखभञ्जन कवीन्द्र’ इनके मान्य शिष्य थे।
महायोगी स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती और दयानन्द सरस्वती का एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था।जिसका वर्णन करना यहाँ प्रासंगिक भी है और विद्वानों की रूचि का विषय भी अतः समासविधि से उसका उल्लेख करते हैं।
दयानंद सरस्वती ने इस ऐतिहासिक शास्त्रार्थ में अपनी पराजय स्वीकार की थी।

यह शास्त्रार्थ काशी में दुर्गाकुण्ड के निकट राजा अमेठी के ‘आनन्दबाग’ में सम्पन्न हुआ था।दयानन्द सरस्वती का आवास यहीं पर था।
विक्रमी सम्वत् १९२६ कार्तिक शुक्ला द्वादशी मङ्गलवार,तदनुसार १६ नवम्बर १८६९ को यह शास्त्रार्थ आयोजित हुआ था।
काशीनरेश महाराज ईश्वरीप्रसादनारायण सिंह अपने १४ वर्षीय राजकुमार के संग अध्यक्ष के पद पर समासीन थे।
उनके मुख्य सभापण्डित साहित्य तथा न्याय के वैदुष्य से मण्डित तथा अनेक ग्रन्थों के प्रणेता ‘श्रीताराचरण तर्करत्न भट्टाचार्य’ साथ में विराजमान थे।बड़ी संख्या में काशी के अन्यान्य विद्वान् समुपस्थित थे।
काशी विद्वन्मण्डली की ओर से दो ही प्रतिनिधि शास्त्रार्थ हेतु चुने गऐ थे स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती और ‘पण्डिताग्रणी बालशास्त्री’।
धार्मिक जनता उत्साह और विस्मयपूर्वक प्रभूत संख्या में उपस्थित थी।
धुरन्धर पण्डितों के अतिरिक्त काशी के प्रख्यात धनी तथा कवि “भारतेन्दु हरिश्चन्द्र” अपने अनुज गोकुलचन्द्र के साथ सभा में विराजित थे।इसके अतिरिक्त काशी के बाहर से भी मान्य सज्जन उपस्थित थे।वेदवाणी पत्रिका मे यह शास्त्रार्थ छपा था तथा जनता की उपस्थिति ६०००० बताई गई थी।पण्डित मथुराप्रसाद दीक्षित ने यह शास्त्रार्थ “सच्चा काशी शास्त्रार्थ” नामक हिन्दी पुस्तक जो १९१६ ई• में प्रकाशित हुई थी, में छापा था।

इस शास्त्रार्थ का विषय था- “मूर्तिपूजा”।

४५ वर्षीय दयानंद सरस्वती मूर्तिपूजा,श्राद्ध आदि को वेदविरूद्ध मानते थे और अपने आग्रह पर दृढ़ता से डटे थे।

काशीनरेश ने अपने सभापण्डित श्रीताराचरण तर्करत्न को सम्बोधित करते हुऐ कहा कि शास्त्रार्थ आरम्भ कीजिए।मैं भी वादी-प्रतिवादी के कथनों का सार ग्रहण करने हेतु पक्षपातशून्य होकर श्रवण करने के लिए सावधानीपूर्वक बैठा हूँ।

श्रीताराचरण तर्करत्न :~ {बोलने के लिए उद्यत होते हैं}

स्वामी दयानंद :~ प्रतिमापूजन वेद में कहाँ लिखा हुआ है?उत्तर एक ही व्यक्ति एक ही बार दें।

ताराचरण :~ केवल वेद ही प्रमाण हैं और कुछ(स्मृतिपुराणेतिहासादि) प्रमाण नहीं हैं इसमें क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानंद :~ वेद में जो नहीं मिलता है,अप्रमाण ही है,वह कथमपि प्रमाण नहीं है।

ताराचरण :~ ऐसा क्यों? अर्थात् जो वेद में न मिले ,परन्तु स्मृतिपुराणादि में उल्लिखित हो,उसे प्रमाण क्यों न माना जाऐ?इनके न मानने में क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानन्द :~ वेदविरूद्ध वस्तुओं का प्रमाण नहीं है।

ताराचरण :~ आपके इस कथन में क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानंद :~ इस कथन में प्रमाण है श्रुति एवं मनुस्मृति।

ताराचरण :~ उसी को बताईऐ।जो वेदमन्त्र वेदातिरिक्त स्मृतिपुराणेतिहासादि के प्रामाण्य का निषेधक है,उसे कहिए।अथवा मनुस्मृति का वह श्लोक ही कहिए जिसमें यह तथ्य प्रतिपादित है।

स्वामी दयानंद :~ प्रामाण्य विचार आगे होगा।सम्प्रति प्रस्तुत वेद विचार कीजिऐ।

ताराचरण :~ कैसा वेदविचार करना चाहते हो?
वेद के नित्य-अनित्यत्व का विचार अथवा वेद की प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता का विचार?

स्वामी दयानंद :~ पत्थर की प्रतिमा का पूजन वेद में कहा है या नहीं? यह विचार करना चाहिऐ।

ताराचरण :~ वेद के समान स्मृत्यादि का प्रामाण्य भी हमें स्वीकृत है।पुराणादिकों में प्रतिमापूजन का विधान है।तब प्रतिमा पूजन शास्त्र से सम्मत सिद्ध हो ही जाता है।

दयानंद स्वामी :~ हम स्मृति तथा पुराण का प्रमाण नही मानते।वेद से अतिरिक्त प्रमाण नही होते।

ताराचरण :~ वेदविरूद्ध क्या है? स्मृति,इतिहासादि तो वेदविरुद्ध नहीं है। तब वेदविरुद्ध किसे कहते हैं आप?

दयानंद स्वामी :~ जो वेद में नही है वह वेदविरुद्ध ही है।

ताराचरण :~ यह वेद का कथन है अथवा श्रीमान् जी का कथन है।

बालशास्त्री :~ वेद में अनुक्त वस्तु अप्रमाण है इस कथन में हेतु क्या है स्वामी जी।?इसका विचार आरम्भ में करना चाहिऐ

दयानंद स्वामी :~ श्रुतिस्मृत्यादि का मूल वेद है।मनु,कात्यायन महाभारत आदि इसके प्रमाण हैं। जिस प्रकार मन्त्रादिकों का तथा वेदान्तमीमांसा के सूत्रों का मूल वेद है, उसी प्रकार प्रतिमा पूजन का मूल वेद में दिखाईऐ।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ क्या बारम्बार आप कहते हैं कि वेदान्तसूत्रों का मूल वेद है।
यदि यह बात है तो बताईऐ “रचनानुपपत्तेश्च नानुमानं प्रमाणं” इस ब्रह्मसूत्र(२•२•१) का मूलभूत वेद कहाँ है?

इसका उत्तर स्वामी दयानंद स्वामी से नही दिया गया।उन्होंने स्वीकारा का मुझे सब वेद कण्ठस्थ नही है और मैं इसका उत्तर नहीं दे सकता।

अब स्वामी दयानंद स्वामी विशुद्धानन्द को कहते हैं -” यदि आपको सब उपस्थित है तो धर्म का लक्षण बताईऐ।”

स्वामी विशुद्धानन्द :~ “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः”।

स्वामी दयानंद :~ धर्म के दश लक्षण हैं। मनु ने लिखा है- “धृतिःक्षमा दमोऽस्तेयः•••••••••

ताराचरण :~ ये दसों धर्म के लक्षण थोड़े ही हैं, ये तो अनुमापक हेतु हैं।

दयानन्द स्वामी क्रुद्ध होकर विशुद्धानन्द जी की ओर मुड़कर बोले -” आप बताओ स्वामी धर्म में कौन श्रुति है?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ “अग्निहोत्रं जुहोत्यादि”।

दयानंद स्वामी ने बात टाल कर कहा -“प्रतिमा पूजन का वेद में कहीं विधान नहीं है।सामवेद के केवल एक मन्त्र में प्रतिमा का निर्देश है,परन्तु वह भूलोक की बात न होकर ब्रह्मलोक की बात है”।

ब्रह्मलोकपरक होने की बात कहने पर बालशास्त्री ने आपत्ति उठाई- “आप जैसा तात्पर्य समझ रहे हैं वैसा तात्पर्यार्थ नही निकलता।
आपके दिए शब्द में अन्वावर्तन शब्द आया है।इसका अर्थ है-“अनु=अनुलक्ष्यीकृत्य आवर्तनम्”।
अर्थात् जब ब्रह्मलोक में उपद्रव हो तो उसके लिए शान्ति करनी चाहिऐ। कहाँ? इस मर्त्यलोक में ही तो।

बालशास्त्री :~ ब्रह्मलोक में कौन शान्ति करेगा?

स्वामी दयानन्द :~ स्वर्गादि लोक में इन्द्रादि देवता हैं या नहीं?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ देवता मन्त्रात्मक होते हैं। इन्द्रादि देवता तत्तत् मन्त्रस्वरूप ही हैं,उनका देह नही होता तब शान्ति करेगा ही कौन?

इस पर दयानन्द स्वामी ने उपासना की बात उठाई।

स्वामी दयानंद :~ उपासना ऐसे देवता की कैसे होती है?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ प्रतीकोपासना होती है।वेद की सहस्राधिक शाखाऐं हैं उन्हीं किसी में यह यह रहस्योद्घाटन हुआ है।
अच्छा ये बताईऐ वेद अपौरुषेय हैं तब इनका प्रवर्तक कौन है?

स्वामी दयानंद :~ वेदों का प्रवर्तक ईश्वर ही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ किस प्रकार के ईश्वर में वेद रहते हैं “नित्य ज्ञान विशिष्ट ईश्वर में ?”
“योगसिद्ध क्लेशादि शून्य ईश्वर में?”
अथवा “सच्चिदानन्द ईश्वर में ?”

दयानन्द रोष में आकर इस प्रश्न का उत्तर न देकर आंखे लाल करके क्रोधमिश्रित स्वर में बोले-

“आपने तो व्याकरण भी बहुत पढ़ा होगा तो बताईऐ- ‘कल्म’ संज्ञा किस की होती है?”

इस पर वैयाकरण बालशास्त्री झट से बोले –

“पतञ्जलि के महाभाष्य में एक स्थान पर परिहास में ही कल्म संज्ञा कही गयी है।परन्तु यह प्रकृत संज्ञा नहीं है।”

आप अप्रकृत की चर्चा क्यों करते हैं?
प्रकृत विचार है पुराणों के वेदविरूद्धता तो इसी पर विचार कीजिऐ न।अन्य चर्चा की आवश्यकता ही क्या?

अब दयानंद स्वामी सम्हलकर बैठ पूछने लगे-

दयानंद स्वामी :~ पुराणों मे ही म्लेच्छभाषा के अध्ययन का निषेध है। वेद में कहाँ है बताईऐ?

बालशास्त्री झट से बोले :~ ” न म्लेच्छतवै नापभाषितवै “
अर्थात् म्लेच्छ भाषा न बोलें न अपशब्द कहें – यही वैदिक वाक्य का प्रमाण है।

विशुद्धानन्द जी ने अर्थविस्तार किया।

दयानंद स्वामी ने किसी विषय पर प्रमाण खोजने हेतु काशीनरेश से वेद की पुस्तक लाने को कहा।
काशीनरेश बोले -“पण्डितों को सब कण्ठस्थ ही है, पोथी की क्या आवश्यक्ता?

अब पुराणों की वैदिकता का प्रसंग उपस्थित हो गया।

दयानंद स्वामी :~ वेदों में जहाँ ‘पुराण’ शब्द आया है वहाँ वह विशेषण है।पुराण का प्रामाण्य है ही नहीं।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ वेद में साक्षात् रूप से भी ‘पुराण’ शब्द प्रयुक्त है-

“आजाह्वे ब्राह्मणानीतिहासान पुराणानि कल्पं गाथा नाराशंसीमेवाहु”।

आपने यहां ‘पुराणानि’ को ‘ब्राह्मणानि’ का विशेषण ही माना है,स्वतन्त्र विशेष्यपद नहीं,मध्य में व्यवधान होने से यह दूरान्वय है।अतएव यह विशेषण नही हो सकता।

स्वामी दयानंद :~ व्यवधान कोई हानि नहीं करता –

“अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे”।
यहाँ दूरान्वय तथा व्यवधान होने पर कोई क्षति नही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ इस वाक्य में सब शब्द विशेषणपद हैं,विशेष्य पद के अभाव में वहां व्यवधान नहीं है।

दयानंद स्वामी :~ “ऋग्वेदं विजानाति••••••इतिहासपुराणः। इस छान्दोग्य श्रुति में भी पुराण विशेषण ही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ आपने जो कहा यह पाठ शुद्ध नहीं है, पाठ है ” इतिहासः पुराणम्”।
‘पुराणं’ इतिहास का विशेषण हो ही नहीं सकता।
क्योंकि यदि यह विशेषण होता तो, विशेष्य का समानलिङ्गी होता।
पुलिङ्ग ‘इतिहास’ शब्द का विशेषण होने पर ‘पुराण’ को भी ‘पुराणः’ पुल्लिङ्ग ही होना चाहिऐ ‘पुराणम्’ नहीं।

सभी सभासदों ने विशुद्धानन्द जी की बात का समर्थन करते हुऐ कहा – “यह पाठ साधु नहीं है”।

स्वामी विशुद्धानन्द जी के इस कथन पर स्वामी दयानंद आत्मविश्वास से गरजते हुऐ बोले-

स्वामी दयानंद :~ “इतिहासपुराणः” इत्येवमेव पाठः इति।
चोचेत् मत्पराजयः, अन्यथा युष्माकं पराजय इति लिख्यताम्।

अर्थात् ‘इतिहासपुराणः’ यही पाठ है। यदि ‘इतिहासः पुराणम्’ निकल आवे तो मेरी पराजय।
यदि ऐसा न निकले तो आप लोगों की पराजय- इसे लिख लो।

आत्मविश्वास से परिपूर्ण उनकी यह अन्तिम उद्घोषणा थी।

इस पर माधवाचारी जी ने शतपथब्राह्मण के अश्वमेध प्रकरण का वह अंश दिखलाया जिसका अन्तिम अंश है-

  "तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति।
   किञ्चित्                 पुराणमाचक्षीत।
   एवमेवाध्वर्युः                  सम्प्रेषयति।
   न          प्रक्रमान्                 जुहोति।

‘पुराणं वेदः’ इस पाठ को देखकर दयानंद स्वामी ग्रन्थ का पन्ना अपने हाथ में लेकर उलट-पुलट कर बहुत देर तक देखते हुए मौन होकर लौटा दिऐ।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पराजय स्वीकार की।

यह ऐतिहासिक शास्त्रार्थ यहीं पूर्ण हो गया।

क्रमशः ••••••••••••••


हर हर महादेव।

ভালোবেসে সংসার করা- মিনাক্ষী মন্ডল

ভালোবেসে সংসার করা- মিনাক্ষী মন্ডল

সমাজে যে যার অবস্থান থেকে এক জন আরেক জনকে ঠকিয়ে চলেছে, ঠকছি সবাই। তবুও আমরা থেমে থাকি না বা নিজের  করণীয় সম্পর্কে সাবধানতা অবলম্বন করি না যে কি করা উচিত আর কি করা উচিত না।অথচ চোর পালালে বুদ্ধি বের হয় সকলের।কিছুদিন আগে এমনই একটা ঘটনা ঘটে গেল মনীষার জীবনে ।মনীষা হচ্ছে রায় বাড়ির একমাত্র পুত্রবধূ। সুন্দরী, শিক্ষিতা, বুদ্ধিমতী  মনীষার এই রায় বাড়িতে বউ হয়ে আসা পনেরো বছর হয়ে গেছে এরই মাঝে শ্বশুর-শাশুড়ি গত হয়েছেন।  সংসারের যাবতীয় কাজ মনীষা নিজের হাতে করে এরজন্য স্বামীর কাছে বাহবাও পায় খুব তাছাড়া সংসারে তার কথার দাম সকলেই দেয়।মনীষা নিজেও এতদিন ভালোবেসে শুধু সংসারই করে গেছে।হঠাৎ একদিন মনীষার বান্ধবীর ফোন এলো, সে জানালো ,’ অফিসের কাজে সে দু’দিনের জন্য কলকাতা আসছে, এই দু’দিন সে মনীষার বাড়িতেই থাকবে’ , খুব ভালো কথা ! মনীষার ও খুব আনন্দ হচ্ছে অনেকদিন পর বান্ধবী কে দেখবে।যথাসময়ে মনীষার বান্ধবী  বাড়িতে এলো, মনীষা লক্ষ্য করছে, তার বান্ধবী সোমার জীবনধারায় অনেক পরিবর্তন হয়েছে, নিজে রোজগার করে, জীবনের স্বাধীনতাও অনেক, এই স্বাধীনতায় অন্যরকম সুখ।    মনীষার বাড়ি থেকে আজ সোমা চলে গেল কিন্তু সোমার একটা কথা মনীষার মনের মধ্যে ঘুরপাক খাচ্ছে…     ‘সারাটা জীবন সংসার সংসার করেই কাটিয়ে দিবি ? জীবনে আর অন্য কিছুর আকাঙ্ক্ষা নেই তোর’ ?
সোমা যাবার পর, সোমার বলা কথা তার স্বামীকে মনীষা জানায়। আজকাল মনীষা মাঝে মাঝেই তার স্বামীকে শোনায়, ‘এই সংসারের জন্য আমি আমার  যোগ্যতা কে কোথাও কাজে লাগাতে পারিনি।’তারপরে একদিন মনীষা হঠাৎ মোবাইলে বিজ্ঞাপন দেখে,’ সিরিয়াল বা ছবিতে অভিনেতা অভিনেত্রী প্রয়োজন ,যদি কেউ ইচ্ছুক যোগাযোগ করতে পারে এই…. নম্বরে’।মনীষা ছোটবেলায় অনেক নাটক করেছে স্কুলে ,পাড়ার স্টেজে।অনলাইনে তাদের সাথে যোগাযোগ করে এবং তারা সেখানে মনীষাকে আড়াই হাজার টাকা সহ কিছু ডকুমেন্টস নিয়ে অফিসে যোগাযোগ করতে বলে । মনীষা তার স্বামীকে জানালে তার স্বামী কোন আপত্তি করে না বা করতে চায়নি সংসারের শান্তি বজায় রাখতে বরং সেদিন মনীষার স্বামী মনীষা কে সঙ্গে করে সেই ফিল্ম প্রোডাকশনে এর অফিসে নিয়ে যায়, সেখানকার হাবভাবে মনীষার স্বামী বুঝতে পেরেছিল যে এটা একটা লোক ঠকানো  প্রতারণার চক্র মাত্র তবুও কোন কথা না বলে স্ত্রী যাতে নিজের ভুল বুঝতে পারে তার জন্য ইচ্ছাকৃত ভাবে তাদের কথার জালে পা দিয়ে ট্রেনিং মারফত আড়াই হাজার টাকা দিয়ে আসে।সেই অফিস থেকে জানানো হয় তিন মাস পর্যন্ত সপ্তাহে একদিন ট্রেনিং দেওয়া হবে।পরের সপ্তাহে আবার মনীষার স্বামী মনীষাকে নিয়ে সেই অফিসে গেলে দেখে এত বড় তালা ঝুলছে, নম্বর অনুযায়ী ফোন করলে not reachable বলে।তারপর একদিন  তাঁরা মনীষার নম্বর  ব্লক দেয়।মনীষা সেই কাজের আশা ছেড়ে দিয়ে, স্বামীর কাছে ক্ষমা চেয়ে  বলে কোনদিন আর কোন কাজের চেষ্টা সে করবে না , সে জীবনে যা পেয়েছে সেটা নিয়ে সুখে থাকতে চায়।মনীষা স্বামী বলেন, ‘ওটা যে একটা প্রতারণা চক্র সেটা তুমি যে বুঝতে পারবে  আমি জানতাম। তাই সেদিন আমি বুঝতে পেরেও তাদের আড়াই হাজার টাকা দিয়ে এসেছিলাম’।  কথাটা শুনে মনীষার আরো রাগ হয়, সে বলে, ‘জেনে বুঝে এতোগুলো টাকা দিয়ে এলে’?মনীষার স্বামী বলে, “তোমাকে বোঝানোর জন্য এই মূল্যটা খুব কম এবং আরো বলে, তোমার বান্ধবীকে বলবে, সৎ পথে, ভালোবেসে করা কোন কাজ ছোট নয়”।মনীষা কাজের সন্ধানের গোঁয়ার্তুমিকে বিসর্জন দিয়ে আগের মতই ভালোবেসে সংসারে মন দিল,সেটাই তার বর্তমানে উপযুক্ত কাজ।এই সংসারটাও সুন্দর করে অনেকেই করতে পারেনা যেটা মনীষা পারে।

                   ।। সমাপ্ত।।

স্কুলের দিনগুলো- ইমরান খান রাজ

স্কুলের দিনগুলো- ইমরান খান রাজ

প্রতিদিনের মতো আজও ঠিক নয়টা বেজে পনেরো মিনিটে বাসা থেকে বের হলাম স্কুলের উদ্দেশ্যে। সাথে আমার প্রিয় নীল সাইকেলটা রয়েছে। ঠিক ১০টায় ক্লাস শুরু হলেও একটু আগে স্কুলে পৌঁছাতে হবে। কারন আগে যেতে না পারলে, নিজের পছন্দ মতো বেঞ্চে বসা যায় না ! বৈশাখে যেই পরিমাণ গরম পরে, এই গরমে রোজ রোজ স্কুলে যেতেও মন টানে না। কিন্তু কি আর করার ? স্কুলে না গেলেও যে আব্বুর হাতে মার খেতে হবে ! তাই বাধ্য হয়ে যেতে হয় মন না চাইলেও।

১৫ মিনিট প্যাডেল মারার পর অবশেষে পৌঁছে গেলাম স্কুলের মাঠে। মেহগনি গাছের সাথে সাইকেল তালা মারছিলাম, হঠাৎ পিছন থেকে ডাক এলো ! মামা! জানিনা ক্লাসের সবাই কোন আনন্দে আমাকে ‘মামা’ বলে ডাকতো ! পিছন ফিরে দেখি করিম চাচা। মুখে মুচকি হাসি নিয়ে আমার দিকে এগিয়ে আসছে। তার পিছু পিছু মনির আর সেলিমও রয়েছে। আসলে করিম আমাদের চেয়ে বয়সে একটু বড় ছিলো। তাই ক্লাসের সবাই ওকে করিম চাচা বলেই ডাকতো ! তিনজন একসাথে এসে আমাকে ঘিরে ধরলো। আমি কিছু জিজ্ঞেস করার আগেই ওরা জানালো যে, আজ ক্লাস করবো না ! স্কুল ফাঁকি দিয়ে এক গ্রামের দিকে ঘুরতে যাবে। সেখানে নাকি বড় বড় পুকুর, খেলার মাঠ, আখের বাগান আর অনেক নারিকেল গাছ আছে। সেখান থেকে ডাব আর আখ চুরি করে খাওয়া যাবে ! 

এতক্ষণে বুঝলাম ওদের উদ্দেশ্য। বাটপারগুলো কেনো একসাথে এসে আমাকে ঘিরে ধরলো সেটার মানে বোঝবার আর বাকি রইলো না আমার। ক্লাস নাইনের ছাত্র ছিলাম তখন আমরা। প্রতিদিন ক্লাস করাটা খুবই গুরুত্বপূর্ণ ছিলো আমাদের জন্য। সামনেই এস. এস. সি পরীক্ষার জন্য ব্যাপক প্রস্তুতি নিতে হবে আমাদের। কারন একটাই, সেটা হলো ভালো রেজাল্ট করতে হবে। বাসা থেকে সবার একটাই চাওয়া। ভালো রেজাল্ট করলে নাকি মোটরসাইকেল কিনে দিবে পাশাপাশি ঢাকার ভালো একটা কলেকে ভর্তি করে দিবে আরো কতো কি লোভনীয় অফার !

ক্লাস ফাঁকি দিয়ে ঘুরতে যাবার উত্তরে আমি না বলাতে তিনজনেই রাগ করলো আমার ওপর। ভবিষ্যতে আমি যদি তাদেরকে কোথাও নিয়ে যেতে চাই, তখন তারা নাকি আমার সাথে যাবেনা সাফ জানিয়ে দিলো। কি আর করার বাধ্য হয়েই রাজি হয়ে গেলাম। সারা দিলাম ওদের অযৌক্তিক ডাকে ! আমাকে ছাড়া নাকি এই ভ্রমণ-অভিযান জমবেই না ! তাহলে তো যেতেই হয়। এটাই তো বন্ধুত্ব। 

ইতিহাস, সাম্প্রদায়িকতা ও ব্রাহ্মণ্যতন্ত্র- নির্মলেন্দু কুণ্ডু

ইতিহাস, সাম্প্রদায়িকতা ও ব্রাহ্মণ্যতন্ত্র- নির্মলেন্দু কুণ্ডু

ভারতবর্ষের ইতিহাসের আলোচনা করতে বসলে ধর্মকে বাদ দেওয়া অসম্ভব ৷ ইতিহাসের যুগবিভাজন করতে বসলে যে প্রাচীন যুগের কথা আমরা পাই, সে সম্পর্কে জানার অন্যতম মূল উপাদান হল বৈদিক সাহিত্য, বিভিন্ন বৌদ্ধ ও জৈন গ্রন্থ ৷ এর পাশাপাশি রামায়ণ-মহাভারতের মতো কাব্যগ্রন্থ তথা ধর্মপুস্তকও অনেক ঐতিহাসিকের দৃষ্টিতে হয়ে পড়ে আকর ৷ সুতরাং ধর্মহীন প্রাচীন ভারত কল্পনাতীত ৷ আর সেই পরিপ্রেক্ষিতেই ধর্মীয় দৃষ্টিভঙ্গী ভারত-ইতিহাস বর্ণনায় অন্যতম ভূমিকা নিয়ে থাকে ৷

আমরা প্রায়শই দেখে থাকি, প্রাচীন ঐতিহ্যের কথা বলতে গেলে আমরা সেই বেদকেন্দ্রিক ও ধর্মবহুল ইতিহাসের আলোচনাই শুরু করি ৷ যা  হিন্দু ধর্মকে মহিমান্বিত করে ৷ অপরদিকে মধ্যযুগের আলোচনা করতে বসলেই অবশ্যম্ভাবী হয়ে পড়ে মুসলিমদের এদেশে আগমন এবং হিন্দুদের সাথে তাদের বিরোধের ব্যাখ্যা-বিবরণ ৷ আর ঠিক এখানটাতেই আলোচনা শুরু করেছেন প্রাবন্ধিক পুলক চন্দ ৷ 
বর্ধমানের শ্যামসুন্দর কলেজের অবসরপ্রাপ্ত অধ্যাপক পুলকবাবু বাংলা সাহিত্য-সংস্কৃতি-ইতিহাসের বিবিধ বিষয়ে গবেষণামূলক গ্রন্থ লিখেছেন ৷ এর মধ্যে আমাদের আলোচ্য প্রবন্ধগ্রন্থটি ছাড়াও “ভিন্নপাঠে বন্দেমাতরম ও একটি দুষ্প্রাপ্য কাব্যগ্রন্থ”, “ব্রিটিশ ভারতে শিক্ষাষড়যন্ত্র” ইত্যাদি গুরুত্বপূর্ণ ৷

বর্তমান ধর্মীয় পরিমন্ডলে দাঁড়িয়ে ধর্মীয় মৌলবাদের বিরুদ্ধে যুক্তিগ্রাহ্য ব্যাখ্যা প্রদানের উদ্দেশ্যেই এই গ্রন্থের অবতারণা ৷ প্রাবন্ধিক দেখিয়েছেন কীভাবে কিছু ‘সাম্প্রদায়িক’ ‘পক্ষপাতদুষ্ট’ ঐতিহাসিক ভারতের ইতিহাসে হিন্দু-মুসলিম বিরোধের কথা তুলে এক খন্ডিত ইতিহাস আমাদের সামনে তুলে ধরেছেন ৷ আর সেই খন্ডিত ইতিহাসকে আরও বিকৃত করছে কিছু উগ্র ধর্মান্ধ মানুষ তাদের সংকীর্ণ স্বার্থসিদ্ধির উদ্দেশ্যে ৷ তিনি কিছু উদাহরণ দিয়ে দেখিয়েছেন, মধ্যযুগে হিন্দু-মুসলিম নির্বিশেষে সাধারণ মানুষের ওপর শোষণ ও অত্যাচার নেমে এসেছিল ও তা করেছিল হিন্দু-মুসলিম নির্বিশেষে ভূম্যধিকারীরা ৷ আবার অ-মুসলিমদের কাছ থেকে প্রাপ্ত জিজিয়া কর চাপানোর উদ্দেশ্য ছিল রাজনৈতিক ৷ ধর্মান্তরন কোন ইসলাম ধর্মাবলম্বী শাসকের মূল কাজ ছিল না, বরং দলে দলে হিন্দুরা ‘সামাজিক সাম্য’ ও ‘উচ্চপদ পাওয়ার লোভে’ ইসলাম ধর্ম গ্রহণ করেছিলেন ৷ কারন সুদীর্ঘকাল ধরে চলে আসা ব্রাহ্মণ্যশ্রেণীর সামাজিক-আর্থিক নিষ্পেশনে তারা দলিত হচ্ছিল ৷ প্রাবন্ধিক আরও দেখিয়েছেন, সমাজপতি ব্রাহ্মণ-উলেমাদের সাথে রাজ্যপতি রাজা-সুলতানদের সম্পর্ক কখনো ছিল এক সুতোয় গাঁথা, কখনো দ্বন্দ্বময় ৷ এবং অবশ্যই তা পারস্পরিক স্বার্থকেন্দ্রিক ৷

গ্রন্থের দ্বিতীয় রচনাটি অধ্যাপক অশোক রুদ্রের ‘ব্রাহ্মণ্য ভাবধারা ও আধুনিক হিন্দু মন’ গ্রন্থের সমালোচনা হিসেবে লেখা হলেও আলোচনার গুণে স্বতন্ত্র রচনা হিসেবে গ্রহণীয় ৷ এখানেও তিনি অধ্যাপক রুদ্রের বক্তব্যের বিরোধিতা করতে উপাদান হিসেবে বেছে নিয়েছেন বিভিন্ন ধর্মীয় ও তৎকেন্দ্রিক গ্রন্থাবলিকে ৷

ইতিহাসমাত্রই বহুকৌণিক ৷ একটা নির্দিষ্ট দৃষ্টিকোণ ইতিহাসে না থাকাটাই বাঞ্ছনীয় ৷ আর বর্তমান সময়ে দাঁড়িয়ে ব্রাহ্মণ্যতন্ত্র, মৌলবাদ, হিন্দু-মুসলিম সম্পর্কের মতো বিতর্কিত বিষয়ের ওপর এমন দৃষ্টিভঙ্গীর পরিচায়ক রচনা পাঠ সময়োপযোগী ও প্রাসঙ্গিক ৷ পাঠক হিসেবে আমাদের মনের ব্যাপ্তি ঘটাতে সাহায্য করবে গ্রন্থটি ৷ কিছু অবাঞ্ছিত বানান ভুল ও সামান্য গুরুগম্ভীর প্রেজেন্টেশন বাদ দিলে গ্রন্থটি যথেষ্ট উপভোগ্য ৷

লেখক পরিচিতি —
নির্মলেন্দু কুণ্ডু পেশায় শিক্ষক হলেও লেখালেখির শুরু সেই ছোট থেকেই ৷ ছোটবেলায় সূর্যসেনা পত্রিকায় লেখা প্রকাশ দিয়ে শুরু, তারপর পরবর্তী জীবনে এ রাজ্য ও ভিন রাজ্যের কিছু পত্রপত্রিকায় লেখা ছাপা হয় ৷ একটি কিশোর উপযোগী গল্প ছাপা হয়েছে আনন্দমেলা পত্রিকাতেও ৷ গল্পের পাশাপাশি কবিতা, প্রবন্ধ ইত্যাদি চর্চার সাথেও যুক্ত ৷ বর্তমানে আমাদের পদক্ষেপ পত্রিকার সম্পাদনার কাজে যুক্ত ৷ শুরু হয়েছে আমাদের পদক্ষেপ প্রকাশনীর কাজও ৷ ইতিমধ্যে ‘এক টুকরো আয়না’, ‘অণুগল্প ১০০’ নামক দুটি সংকলনগ্রন্থে গল্প ও ‘কবিতা স্টেশন’ গ্রন্থে কবিতা প্রকাশিত হওয়ার পাশাপাশি প্রকাশিত হয়েছে একক কবিতার বই ‘রোমন্থন’ ও একক গল্পের বই (পিডিএফ আকারে) ‘১৬ আনা’ ৷

পতিতা- সম্পদ দে

পতিতা- সম্পদ দে

দেখোতো দাদা চিনতে পারো কি না!

আমি তোমার বুক জুড়ানো হিয়া।

আমি তোমার কান জুড়ানো ধন।

আমি তোমার….আমি তোমার….

ধুৎ, আর চলে না ,আর চলে না,কথার ওপর কথার বড় ঢ–ং।

 

তোমার মনে আছে…

সেই সেবারে ইস্কুলেতে ছুটতে গিয়ে

আমিমন্দ কথা কতই কানাকানি।

আদ-দামরি মেয়ে বলে লোকে,

লাজ-লজ্জ্বা কিচ্ছুটি নেই মোটে।

হাফ-প্যান্টে উর্দ্ধশ্বাসে  ছোটে,

চ্যাঁংড়া ছোড়া দেখতে সেসব জোটে।

পুরস্কৃত হলাম বটে আমি…

খেলা-ধুলোয়  ইতি দিলে টানি।


তখন আমি এইটে

পড়িকিচ্ছুটি এর বুঝতে নারি।

তোমরা আমায় ওষুধ দিলে

বেটেজ্ঞান-চক্ষু উঠল আমার ফুটে।

আর কি করি,সব জানা যে হল আমার 

সংসারকে জানি!

মাধ্যমিকের বেলায় আমি হরকে গেলাম বাড়ি।

ভাত দুটো তবু দু’বেলাতে যত্নে খেতাম আমি।


সইল না আর!

রেগে আমায় নিয়ে গেলে,

 খাওয়ার জন্য খোঁটা দিলে, কর্ম দিলে ভারি।

দোকানের পসরা হবে,সুন্দরী ও নারী! 

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লিঙ্গবৈষম্য ও সার্বজনীন দুর্গোৎসব – সুরভি ঝা

লিঙ্গবৈষম্য ও সার্বজনীন দুর্গোৎসব - সুরভি ঝা

পূজো আমার, পূজো তোমার, পূজো সবার। কারণ দুর্গাপূজো বাঙালির শ্রেষ্ঠ পূজো। একবিংশ শতাব্দীতে দাঁড়িয়ে যে প্রশ্ন মাথায় আসে তা হলো সত্যিই কি পূজোর বেদী সবাই কে সমানভাবেই আহ্বান জানায়? বেদীর উপর রাজ করতে দেখা যায় পুরোহিত মশাইদের। তারপর যাদের পূজো তাদের আভিজাত্য ঝলমল করে। পুরুষ লিঙ্গ আয়োজন করে, স্ত্রী- লিঙ্গ জোগাড় করার সাথে সাথে আবার দশভূজা হয়ে বাকিটুকুও সামলে নেয়। মা দূর্গার দশভূজা হ‌ওয়ার ক্ষমতাকে যেইভাবে আমরা মহিমান্বিত করি, মহিলাদের এই সমস্ত কাজ সামলানোর প্রথাকেও আমরা এক‌ইভাবে বাহবা দিয়ে থাকি। এরপরে আসে আর এক লিঙ্গের পূজো, রুপান্তরকামীদের পূজো। তারা বেদীর ঠিক কোন জায়গায় থাকে? আরতি হাতে নিয়ে থাকে? না ঘন্টা বাজায়? না মালা গাঁথে? জানা নেই।কোলকাতায় রঞ্জিতা সিনহা নিজ বাসভবনে অর্ধনারীশ্বর মূর্তি পূজা করে। কারণ সেটি রূপান্তরকামী সত্ত্বার প্রতিফলন। মানসিক ভাবে তারা স্ত্রীসুলভ, শারীরিকভাবে তারা পুরুষালী। মূর্তি গড়ে তারা নিজেরাই, কুমোরটুলির শিল্পীদের আদোলে। নিজেদেরই আয়োজনে, ও ফান্ডে অনুষ্ঠিত হয় তাদের পূজো। নারীর শরীর তার নারীত্বের জন্য শিকার পুরুষালী চাহিদার কাছে। এই দুই লিঙ্গের এক দেহে বিচরণ সেই দেহটিকে ঘাবড়ে দেয় সবথেকে বেশি। কিন্তু মনুষ্যোচিত বৈশিষ্ট্য থেকে ভ্রষ্ট(ডিহিউম্যানাইজ)করে না কোন ভাবেই। তা না জানায় অথবা জানার বিষয়ের মধ্যেই না রাখার কারণে পুরুষ ও স্ত্রী লিঙ্গের পরের জায়গাটা ফর্মে “আদার” হিসেবে পেলেও পূজো মণ্ডপে দেখা যায় না তাদের। মেয়ের সাজে এসেও পুরুষের আওয়াজ এলিয়েন-সম গড়ে তোলে তাদের। বন্ধু বান্ধবীর দলে স্থান হয় না তাদের।মায়ের মূর্তিকে কুমোরটুলি বানায় নারীর যথাযথ শারীরিক মাপ ও পুরুষালি দৃকপাত অনুযায়ী। মা দূর্গার নারীশক্তির প্রতীক তখনই হয়ে ওঠে যখন তার রোষে অরাজকতার মৃত্যু হয়। যখন পুরুষের অন্ডকোষে তৃপ্তি জাগানো নারীটিকে সে বশ করতে পারে না চিরাচরিত রীতি অনুসারে। যাকে বশ করা যায় না, তাকে সমাজ বরণ করে না। দূর্গাবরণ তখন হয় যখন সে সম্পূর্ণ মাটির প্রতিমা- ধীর ও শান্ত। ইংরেজিতে রুপান্তরকামীদের আমরা ‘ট্রান্সজেন্ডার’ বলে থাকি। ‘ট্রান্স’ অর্থাৎ ‘বিয়ন্ড’, অর্থাৎ অতিক্রম করে। ‘জেন্ডার’ বলতে বোঝায় সেই শরীরটিকে যাকে সমাজ তার মতোন করে গঠন করতে চায়, জীবতাত্ত্বিক পার্থক্যের বাইরে গিয়ে। ‘ট্রান্সজেন্ডার’ কথাটির মানে তাই সামাজিক বাঁধনের উর্ধ্বে গিয়ে জুডিথ বাটলারের ‘পারফরম্যান্স’ এর ভিত্তিতে গড়ে ওঠে যেই লিঙ্গ। সাইমন দি বিউভয়ার এর মতানুযায়ী নারীর অবস্থান সমাজে ‘আগন্তুক’ এর মতন। সভ্যতা পুরুষোচিত। এই সমাজে ট্রান্সজেন্ডারের অবস্থান সুতরাং আরও প্রান্তিক। যার পূজোর মণ্ডপে স্বাধীনভাবে ঘুরে বেড়ানোর অধিকার নেই। পূজোর এই সার্বজনীনতা নিয়ে তাই প্রশ্ন ওঠে বারংবার!  পূজোর আনন্দ কী প্রকৃতই সবার সামর্থ্যৈর মধ্যে পড়ে? লিঙ্গের পরিচয় দুর্গা পূজোর উদযাপনকে নির্ধারণ করে যেখানে, সেখানে মা দূর্গার সার্বজনীনতা প্রশ্নাতীত কখোনো হতে পারে না। সুতরাং দুর্গোৎসব সার্বজনীন করার দায়িত্ব কিন্তু আমাদের সকলের। শত্রুতা থাক কোভিডের সাথে, নির্দিষ্ট লিঙ্গের সাথে নয়। যাতে সত্যিই পুজো সবার হতে পারে এই চেষ্টা আমাদের থাকুক।

লেখিকার পরিচয়:

সুরভি ঝা বর্তমানে রায়গঞ্জ বিশ্ববিদ্যালয়ের গবেষক। তার নিজস্ব সংস্থার মাধ্যমে বিভিন্ন সামাজিক কাজের সঙ্গে জড়িত।

শব্দহীন আলোর বেণু – রাজ কুমার দাস

শব্দহীন আলোর বেণু - রাজ কুমার দাস

বৃষ্টির ফোঁটা জানালা দিয়ে উকি দিলেও,

ভেতরের সবুজ আলো বুক চিরে আর বেরিয়ে আসে না।

হয় তো চিরকালের জন্য মৃত লাশ হয়ে গেছে নরম হাতের পেন্সিল,

যেমনটা টিফিন বক্সে বন্দী হয়েছে হজমির বিকেল।

তাই প্রাণপণে ছুটে ঘোড়ার দল তারা করার সময় এখন,

একটা ঘোড়া ধরতে পেলে , আবার সামনের টির জন্য ইশারা।

এরই মাঝে ধ্বংসস্তূপে পাওয়া যায় বায়না ধরা কচি আঙুল,

সাথে ন্যাপথলিন ও কাশফুল সমেত পালিয়ে গেছে আয়নার ওপারে ।

এখন পিঠব্যাগের বোঝা ফেরার ট্রেনের কামরা থেকে বিছানা পর্যন্তও আসে,

আঙুল দুটো তাই ভার্চুয়াল প্রেমের ছোঁয়া তেই সন্তুষ্ট,

রেডিও এর নব্ ও বইয়ের পৃষ্ঠার আদরতো সেগুলোর কাছে  সোনার পাথরবাটি।

চকচকে ফ্রেমে রাজত্ব করে চলেছে এই শব্দহীন আলোর বেণু,

শেষ ঘোড়া ধরতে পাওয়ার পর যেখানে আর পা ফেলার মাটি নেই ।

আদতে এটাই হলো জোর পূর্বক বুকে গেঁথে দেওয়া  দর্শন ,

“দাড়ি গোঁফ এর ঘন ভাজে চিরতরে লুকিয়ে যায় তারাবাতির স্ফুলিঙ্গ”।

নিজস্ব আধিপত্য – মহাজিস মণ্ডল

নিজস্ব আধিপত্য - মহাজিস মণ্ডল

ওই যাবতীয় বিষাদ আত্মস্থ করে
বুকের গহীনে জমিয়ে রাখছি দহন
 
আজকাল আলোও ইশারায় বাঁকে
           অন্ধকার, শামুকের মতো হেঁটে যায়
 
হৃদয় ভাঙা অশ্রুও
অবিশ্রান্ত বৃষ্টির ভিড়ে নিজস্ব আধিপত্য হারায়…

বহতা – অদিতি ঘটক

বহতা - অদিতি ঘটক

কোনো কোনো দিন নদীর পাশে বসি

ভেতরে ভেতরে অগ্নুৎপাত

লাভা ক্ষরণ

ফল্গুর মত চোরা স্রোত

আগ্নেয় গিরির জ্বালামুখ হতে ইচ্ছে হয় খুব

ইচ্ছে হয় সশব্দ হুঙ্কারে উত্তপ্ত লাভা উদ্গারের 

নদী এসবের কোনো খবর রাখে না

আপন ছন্দে বয়ে যাওয়াতে সে বিভোর

নদী হাসায়, কাঁদায়, ভাসায়

ফুঁসে উঠে, গর্জন করে, শীর্ণ হয়

সুমিষ্ট থেকে লবনাক্ত হয়।


সূর্যের ঝিলিমিলি আলো খেলা করে  দেহ ঘিরে

চাঁদের ছায়া ভেঙে ভেঙে পড়ে

সারা শরীর জুড়ে হিরের কুচির দ্যুতি


আমি কোনো দিন নদীকে আগুন নেভাতে দেখিনি

দেখিনি অগ্নুৎপাতকে নদীর কাছে আসতে

তবুও নদীর গায়ে অসংখ্য হিরের কুচি

যেমন করে একবুক দাহ নিয়ে পোড়া কাঠ হতে হতে

আমরা ফুল ফোটাই,গান গাই পরস্পরকে ভালোবাসি

লেখক পরিচিতি:

মূলত গৃহবধূ। ভালবাসা লেখালেখি। কবিতা, গল্প, প্রবন্ধ এই ধারাতে বিচরণ। কয়েকটি বাণিজ্যিক ও অবাণিজ্যিক পত্রিকাতে লেখা প্রকাশিত। একটি লিটিল ম্যাগের সম্পাদক। বেশ কিছু ই ম্যাগেও লেখা প্রকাশিত হয়। প্রধানত বাংলা ভাষায় লিখি।

বন্ধু তোমায় – শুভজিৎ চট্টোপাধ্যায়

বন্ধু তোমায় - শুভজিৎ চট্টোপাধ্যায়

ব্যালকনিতে দাঁড়িয়ে বৃষ্টি ভেজা শহরের দিকে তাকিয়ে থাকতে থাকতে মনটা খারাপ হয়ে গেল চন্দ্রিমার।
 ঝমঝম করে বৃষ্টি পড়ছে। এই ব্যালকনিটাতে দাঁড়ালে অনেকটা দূর অবধি দেখা যায়। বিস্তৃত সড়ক, উড়ালপুল— সব এখন শুনশান। এ লকডাউন যে আর কতদিন চলবে..! চন্দ্রিমা একটা দীর্ঘশ্বাস ছাড়ে। 
  দক্ষিণ কলকাতার অভিজাত এই আবাসনের দু’খুপরির ফ্ল্যাটে একাই থাকে চন্দ্রিমা। চল্লিশোর্ধ বয়সে কোনো কিছুর অভাব না থাকলেও, এই নিঃসঙ্গতার হাতছানি তাকে বড্ড পীড়া দেয়। দীর্ঘ চার-পাঁচ বছর ধরে প্রতিদিন ডিপ্রেশানের ওষুধ গিলে তাকে বেঁচে থাকতে হচ্ছে। মলয়ের সঙ্গে ডিভোর্সটা হয়ে যাওয়ার পর থেকেই এইসব রোগ আরও যেন মাথাচাড়া দিয়ে উঠেছে। 
  আগে তবুও বাইরে বেরোনোর একটা স্বাধীনতা ছিল। কিন্তু এখন এই বন্দি জীবন…।
  কত আর সোশ্যাল মিডিয়া নিয়ে থাকবে? ফোন করে সময় কাটানোর লোকও আর কোথায়? চন্দ্রিমা দেখেছে মা-বাবা চলে যাওয়ার পর বাকি সম্পর্কগুলোও কেমন যেন ঢিলে-ঢালা হয়ে গেছে। নিজের মানসিক দুঃখ, অবসাদ ভাগ করে নেওয়ার জন্য ওর কোনো বন্ধু নেই। সবাই তাকে এড়িয়ে যেতে চায়। ফোন করার প্রয়োজনীয়তা দেখায় না তেমন। চন্দ্রিমার স্মার্টফোনের রিংটোনে আর বেজে ওঠে না চন্দ্রবিন্দুর গান— ‘বন্ধু তোমায়…’ ।
  অথচ ফেসবুকে কিছু পোস্ট করলে লাইক, কমেন্টের বন্যা বয়ে যায়। আচ্ছা, যারা এত লাইক দেয়, কমেন্ট করে, ওরাও তো বন্ধু, নাকি শুধুই পরিচিত? তাদের সঙ্গে মনের সব কথা শেয়ার করার কি কোনো পরিসর নেই? বোধহয় নেই। নাহলে চার হাজার বন্ধু, আর কয়েক শো ফলোয়ার নিয়েও এই নিঃসঙ্গতা কেন?
তেমনই একটা সন্ধ্যে। লকডাউন। বাইরে বৃষ্টি পড়ছে। হঠাৎ একটা ফেসবুক পোস্ট। তারপরই ফেসবুক লাইভে ভেসে উঠল চন্দ্রিমার মুখ। ফ্যাকাসে, রুগ্ন। ল্যাম্পের হলদেটে আলোয় চন্দ্রিমার পেছনে সিলিং থেকে কী একটা যেন ঝুলতে দেখা যাচ্ছে। 
  চন্দ্রিমা টেবিলের ওপর ফোনটা সেট্ করে বিছানায় গিয়ে দাঁড়াল। এবার স্পষ্ট দেখা যাচ্ছে সবকিছু। সিলিং-এর থেকে এতক্ষণ যেটা ঝুলতে দেখা গেছে সেটা একটা কাপড়ের ফাঁস। একী! এটা কী করছে চন্দ্রিমা!
 বিছানায় একটা টুলের ওপর দাঁড়িয়ে ফাঁসটা গলায় গলিয়ে নিয়েছে সে। মুহূর্তের দমকা বাতাসে ফোনটা ছিটকে পড়ল মেঝেতে। একটা গোঙানির শব্দ…
চুড়মার হয়ে যাওয়া মোবাইলের স্ক্রিনে শুধু ঝুলন্ত দু’টো পা। নিথর।
বৃষ্টির শব্দকে ছাপিয়ে একনাগাড়ে ফোনটা বেজে যাচ্ছে আজ। সেই রিংটোন…চন্দ্রবিন্দুর গান…‘বন্ধু তোমায় এ গান শোনাব বিকেল বেলায়…বন্ধু তোমায়…।’
কেউ ধরছে না আর…।