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स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती एवं स्वामी दयानंद सरस्वती का शास्त्रार्थ

स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती एवं स्वामी दयानंद सरस्वती का शास्त्रार्थ

काशी में हुऐ कुछ ऐतिहासिक शास्त्रार्थ :~

“वादे-वादे जायते तत्वबोधः”

प्राचीनकाल से ही काशी में प्रतिदिन शास्त्रसभा का आयोजन होता था।सभा में विराजमान शास्त्रमहारथी पहले शास्त्रार्थ करते थे तत्पश्चात् दक्षिणा ग्रहण करते थे।नागपञ्चमी के दिन काशी के नागकुआँ पर शास्त्रज्ञों तथा छात्रों में शास्त्रार्थ करने की परम्परा वर्तमान में भी है।
वर्तमान में भी विवाह के अवसर पर कन्या और वर पक्ष के विद्वान् परस्पर विविधोपयोगी प्रमेयों पर शास्त्रार्थ करते हैं।अब इस परम्परा का ह्रास होने लगा है।काशी चूँकि व्याकरणशास्त्र की अध्ययनस्थली तथा महर्षि पतञ्जलि की कर्मस्थली होने के कारण शास्त्रविषयक उहापोह के लिए पुरातनकाल से ही जानी जाती है।
विद्वानों की क्रीडास्थली काशी में वर्षों से ऐतिहासिक शास्त्रार्थ सम्पन्न हुऐ है।कुछेक शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध भी किया गया है परन्तु अधिकांश प्रसिद्ध शास्त्रार्थों को लिपिबद्ध ही नहीं किया गया है।

‘वैयाकरण केशरी महामहोपाध्याय पण्डित दामोदर शास्त्री’ तथा मैथिल विद्वत्वरेण्य ‘पण्डित बच्चा झा’ के मध्य जो अद्भुत् शास्त्रार्थ हुआ था उस अद्वितीय शास्त्रार्थ ने इतिहास में स्थान पा लिया है।
इस गम्भीर शास्त्रार्थ को देखने के लिए विद्वानों के अतिरिक्त हजारों की संख्या में साधारण जनता भी सम्मिलित हुई थी।

एतदतिरिक्त काशी के उद्भट् विद्वान् ‘महामहोपाध्याय पण्डित गङ्गाधर शास्त्री’ तथा वल्लभसम्प्रदाय के प्रसिद्ध पण्डित प्रज्ञाचक्षु ‘श्रीगट्टूलालजी’ से गोपालमन्दिर में जो प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ वह भी इतिहास का विषय बन गया है।इस शास्त्रार्थ में पं• गङ्गाधर जी को विजयश्री प्राप्त हुई थी।
आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से काशी के अनेक विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ था।किन्तु यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि दयानंद सरस्वती को प्रत्येक शास्त्रार्थ में पराजय स्वीकार करनी पड़ी थी भले ही आर्यसमाज के अनुयायी इस सत्य को स्वीकार न करें।
काशी के ‘पंडित बालशास्त्री’ जो अपने वैदुष्य से बलात् सभी को मोहित कर लेते थे इनके साथ दयानंद सरस्वती का एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था।इस शास्त्रार्थ में पं• बालशास्त्री जी ने दयानंद सरस्वती के ‘दम्भ’ को खण्ड-खण्ड किया था।इस शास्त्रार्थ में दयानंद सरस्वती ने काशी के सभी विद्वानों और अपने अनुयायियों के मध्य अपनी पराजय स्वीकार की थी।

१९वीं शती में ‘स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती’ जी ने अपने अलौकिक अगाध वैदुष्य से विद्यानगरी वाराणसी को अलंकृत किया था।महाराज ने अपनी शास्त्रीय शेमुषी तथा योगविद्या के प्रभाव से काशी के इतिहास में अपना नाम अंकित करवाया है।
इनका जन्म कान्यकुब्ज ब्राह्मणकुल में १७२० शाके(१८२०ई•)में हुआ था।इन महायोगी का प्रभाव सार्वभौम था।उत्तर भारत के राजा-महाराजा इनके पाद्पद्मों में लोट-पोट होकर स्वयं को धन्यातिधन्य अनुभव करते थे।सरस्वती और लक्ष्मी का नैसर्गिक विरोध इनके समक्ष शान्त हो गया था।
काशीनरेश प्रभु नारायणसिंह इनके अनन्य सेवक थे।प्रण्डितप्रवर ‘दुःखभञ्जन कवीन्द्र’ इनके मान्य शिष्य थे।
महायोगी स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती और दयानन्द सरस्वती का एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था।जिसका वर्णन करना यहाँ प्रासंगिक भी है और विद्वानों की रूचि का विषय भी अतः समासविधि से उसका उल्लेख करते हैं।
दयानंद सरस्वती ने इस ऐतिहासिक शास्त्रार्थ में अपनी पराजय स्वीकार की थी।

यह शास्त्रार्थ काशी में दुर्गाकुण्ड के निकट राजा अमेठी के ‘आनन्दबाग’ में सम्पन्न हुआ था।दयानन्द सरस्वती का आवास यहीं पर था।
विक्रमी सम्वत् १९२६ कार्तिक शुक्ला द्वादशी मङ्गलवार,तदनुसार १६ नवम्बर १८६९ को यह शास्त्रार्थ आयोजित हुआ था।
काशीनरेश महाराज ईश्वरीप्रसादनारायण सिंह अपने १४ वर्षीय राजकुमार के संग अध्यक्ष के पद पर समासीन थे।
उनके मुख्य सभापण्डित साहित्य तथा न्याय के वैदुष्य से मण्डित तथा अनेक ग्रन्थों के प्रणेता ‘श्रीताराचरण तर्करत्न भट्टाचार्य’ साथ में विराजमान थे।बड़ी संख्या में काशी के अन्यान्य विद्वान् समुपस्थित थे।
काशी विद्वन्मण्डली की ओर से दो ही प्रतिनिधि शास्त्रार्थ हेतु चुने गऐ थे स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वती और ‘पण्डिताग्रणी बालशास्त्री’।
धार्मिक जनता उत्साह और विस्मयपूर्वक प्रभूत संख्या में उपस्थित थी।
धुरन्धर पण्डितों के अतिरिक्त काशी के प्रख्यात धनी तथा कवि “भारतेन्दु हरिश्चन्द्र” अपने अनुज गोकुलचन्द्र के साथ सभा में विराजित थे।इसके अतिरिक्त काशी के बाहर से भी मान्य सज्जन उपस्थित थे।वेदवाणी पत्रिका मे यह शास्त्रार्थ छपा था तथा जनता की उपस्थिति ६०००० बताई गई थी।पण्डित मथुराप्रसाद दीक्षित ने यह शास्त्रार्थ “सच्चा काशी शास्त्रार्थ” नामक हिन्दी पुस्तक जो १९१६ ई• में प्रकाशित हुई थी, में छापा था।

इस शास्त्रार्थ का विषय था- “मूर्तिपूजा”।

४५ वर्षीय दयानंद सरस्वती मूर्तिपूजा,श्राद्ध आदि को वेदविरूद्ध मानते थे और अपने आग्रह पर दृढ़ता से डटे थे।

काशीनरेश ने अपने सभापण्डित श्रीताराचरण तर्करत्न को सम्बोधित करते हुऐ कहा कि शास्त्रार्थ आरम्भ कीजिए।मैं भी वादी-प्रतिवादी के कथनों का सार ग्रहण करने हेतु पक्षपातशून्य होकर श्रवण करने के लिए सावधानीपूर्वक बैठा हूँ।

श्रीताराचरण तर्करत्न :~ {बोलने के लिए उद्यत होते हैं}

स्वामी दयानंद :~ प्रतिमापूजन वेद में कहाँ लिखा हुआ है?उत्तर एक ही व्यक्ति एक ही बार दें।

ताराचरण :~ केवल वेद ही प्रमाण हैं और कुछ(स्मृतिपुराणेतिहासादि) प्रमाण नहीं हैं इसमें क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानंद :~ वेद में जो नहीं मिलता है,अप्रमाण ही है,वह कथमपि प्रमाण नहीं है।

ताराचरण :~ ऐसा क्यों? अर्थात् जो वेद में न मिले ,परन्तु स्मृतिपुराणादि में उल्लिखित हो,उसे प्रमाण क्यों न माना जाऐ?इनके न मानने में क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानन्द :~ वेदविरूद्ध वस्तुओं का प्रमाण नहीं है।

ताराचरण :~ आपके इस कथन में क्या प्रमाण है?

स्वामी दयानंद :~ इस कथन में प्रमाण है श्रुति एवं मनुस्मृति।

ताराचरण :~ उसी को बताईऐ।जो वेदमन्त्र वेदातिरिक्त स्मृतिपुराणेतिहासादि के प्रामाण्य का निषेधक है,उसे कहिए।अथवा मनुस्मृति का वह श्लोक ही कहिए जिसमें यह तथ्य प्रतिपादित है।

स्वामी दयानंद :~ प्रामाण्य विचार आगे होगा।सम्प्रति प्रस्तुत वेद विचार कीजिऐ।

ताराचरण :~ कैसा वेदविचार करना चाहते हो?
वेद के नित्य-अनित्यत्व का विचार अथवा वेद की प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता का विचार?

स्वामी दयानंद :~ पत्थर की प्रतिमा का पूजन वेद में कहा है या नहीं? यह विचार करना चाहिऐ।

ताराचरण :~ वेद के समान स्मृत्यादि का प्रामाण्य भी हमें स्वीकृत है।पुराणादिकों में प्रतिमापूजन का विधान है।तब प्रतिमा पूजन शास्त्र से सम्मत सिद्ध हो ही जाता है।

दयानंद स्वामी :~ हम स्मृति तथा पुराण का प्रमाण नही मानते।वेद से अतिरिक्त प्रमाण नही होते।

ताराचरण :~ वेदविरूद्ध क्या है? स्मृति,इतिहासादि तो वेदविरुद्ध नहीं है। तब वेदविरुद्ध किसे कहते हैं आप?

दयानंद स्वामी :~ जो वेद में नही है वह वेदविरुद्ध ही है।

ताराचरण :~ यह वेद का कथन है अथवा श्रीमान् जी का कथन है।

बालशास्त्री :~ वेद में अनुक्त वस्तु अप्रमाण है इस कथन में हेतु क्या है स्वामी जी।?इसका विचार आरम्भ में करना चाहिऐ

दयानंद स्वामी :~ श्रुतिस्मृत्यादि का मूल वेद है।मनु,कात्यायन महाभारत आदि इसके प्रमाण हैं। जिस प्रकार मन्त्रादिकों का तथा वेदान्तमीमांसा के सूत्रों का मूल वेद है, उसी प्रकार प्रतिमा पूजन का मूल वेद में दिखाईऐ।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ क्या बारम्बार आप कहते हैं कि वेदान्तसूत्रों का मूल वेद है।
यदि यह बात है तो बताईऐ “रचनानुपपत्तेश्च नानुमानं प्रमाणं” इस ब्रह्मसूत्र(२•२•१) का मूलभूत वेद कहाँ है?

इसका उत्तर स्वामी दयानंद स्वामी से नही दिया गया।उन्होंने स्वीकारा का मुझे सब वेद कण्ठस्थ नही है और मैं इसका उत्तर नहीं दे सकता।

अब स्वामी दयानंद स्वामी विशुद्धानन्द को कहते हैं -” यदि आपको सब उपस्थित है तो धर्म का लक्षण बताईऐ।”

स्वामी विशुद्धानन्द :~ “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः”।

स्वामी दयानंद :~ धर्म के दश लक्षण हैं। मनु ने लिखा है- “धृतिःक्षमा दमोऽस्तेयः•••••••••

ताराचरण :~ ये दसों धर्म के लक्षण थोड़े ही हैं, ये तो अनुमापक हेतु हैं।

दयानन्द स्वामी क्रुद्ध होकर विशुद्धानन्द जी की ओर मुड़कर बोले -” आप बताओ स्वामी धर्म में कौन श्रुति है?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ “अग्निहोत्रं जुहोत्यादि”।

दयानंद स्वामी ने बात टाल कर कहा -“प्रतिमा पूजन का वेद में कहीं विधान नहीं है।सामवेद के केवल एक मन्त्र में प्रतिमा का निर्देश है,परन्तु वह भूलोक की बात न होकर ब्रह्मलोक की बात है”।

ब्रह्मलोकपरक होने की बात कहने पर बालशास्त्री ने आपत्ति उठाई- “आप जैसा तात्पर्य समझ रहे हैं वैसा तात्पर्यार्थ नही निकलता।
आपके दिए शब्द में अन्वावर्तन शब्द आया है।इसका अर्थ है-“अनु=अनुलक्ष्यीकृत्य आवर्तनम्”।
अर्थात् जब ब्रह्मलोक में उपद्रव हो तो उसके लिए शान्ति करनी चाहिऐ। कहाँ? इस मर्त्यलोक में ही तो।

बालशास्त्री :~ ब्रह्मलोक में कौन शान्ति करेगा?

स्वामी दयानन्द :~ स्वर्गादि लोक में इन्द्रादि देवता हैं या नहीं?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ देवता मन्त्रात्मक होते हैं। इन्द्रादि देवता तत्तत् मन्त्रस्वरूप ही हैं,उनका देह नही होता तब शान्ति करेगा ही कौन?

इस पर दयानन्द स्वामी ने उपासना की बात उठाई।

स्वामी दयानंद :~ उपासना ऐसे देवता की कैसे होती है?

स्वामी विशुद्धानन्द :~ प्रतीकोपासना होती है।वेद की सहस्राधिक शाखाऐं हैं उन्हीं किसी में यह यह रहस्योद्घाटन हुआ है।
अच्छा ये बताईऐ वेद अपौरुषेय हैं तब इनका प्रवर्तक कौन है?

स्वामी दयानंद :~ वेदों का प्रवर्तक ईश्वर ही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ किस प्रकार के ईश्वर में वेद रहते हैं “नित्य ज्ञान विशिष्ट ईश्वर में ?”
“योगसिद्ध क्लेशादि शून्य ईश्वर में?”
अथवा “सच्चिदानन्द ईश्वर में ?”

दयानन्द रोष में आकर इस प्रश्न का उत्तर न देकर आंखे लाल करके क्रोधमिश्रित स्वर में बोले-

“आपने तो व्याकरण भी बहुत पढ़ा होगा तो बताईऐ- ‘कल्म’ संज्ञा किस की होती है?”

इस पर वैयाकरण बालशास्त्री झट से बोले –

“पतञ्जलि के महाभाष्य में एक स्थान पर परिहास में ही कल्म संज्ञा कही गयी है।परन्तु यह प्रकृत संज्ञा नहीं है।”

आप अप्रकृत की चर्चा क्यों करते हैं?
प्रकृत विचार है पुराणों के वेदविरूद्धता तो इसी पर विचार कीजिऐ न।अन्य चर्चा की आवश्यकता ही क्या?

अब दयानंद स्वामी सम्हलकर बैठ पूछने लगे-

दयानंद स्वामी :~ पुराणों मे ही म्लेच्छभाषा के अध्ययन का निषेध है। वेद में कहाँ है बताईऐ?

बालशास्त्री झट से बोले :~ ” न म्लेच्छतवै नापभाषितवै “
अर्थात् म्लेच्छ भाषा न बोलें न अपशब्द कहें – यही वैदिक वाक्य का प्रमाण है।

विशुद्धानन्द जी ने अर्थविस्तार किया।

दयानंद स्वामी ने किसी विषय पर प्रमाण खोजने हेतु काशीनरेश से वेद की पुस्तक लाने को कहा।
काशीनरेश बोले -“पण्डितों को सब कण्ठस्थ ही है, पोथी की क्या आवश्यक्ता?

अब पुराणों की वैदिकता का प्रसंग उपस्थित हो गया।

दयानंद स्वामी :~ वेदों में जहाँ ‘पुराण’ शब्द आया है वहाँ वह विशेषण है।पुराण का प्रामाण्य है ही नहीं।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ वेद में साक्षात् रूप से भी ‘पुराण’ शब्द प्रयुक्त है-

“आजाह्वे ब्राह्मणानीतिहासान पुराणानि कल्पं गाथा नाराशंसीमेवाहु”।

आपने यहां ‘पुराणानि’ को ‘ब्राह्मणानि’ का विशेषण ही माना है,स्वतन्त्र विशेष्यपद नहीं,मध्य में व्यवधान होने से यह दूरान्वय है।अतएव यह विशेषण नही हो सकता।

स्वामी दयानंद :~ व्यवधान कोई हानि नहीं करता –

“अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे”।
यहाँ दूरान्वय तथा व्यवधान होने पर कोई क्षति नही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ इस वाक्य में सब शब्द विशेषणपद हैं,विशेष्य पद के अभाव में वहां व्यवधान नहीं है।

दयानंद स्वामी :~ “ऋग्वेदं विजानाति••••••इतिहासपुराणः। इस छान्दोग्य श्रुति में भी पुराण विशेषण ही है।

स्वामी विशुद्धानन्द :~ आपने जो कहा यह पाठ शुद्ध नहीं है, पाठ है ” इतिहासः पुराणम्”।
‘पुराणं’ इतिहास का विशेषण हो ही नहीं सकता।
क्योंकि यदि यह विशेषण होता तो, विशेष्य का समानलिङ्गी होता।
पुलिङ्ग ‘इतिहास’ शब्द का विशेषण होने पर ‘पुराण’ को भी ‘पुराणः’ पुल्लिङ्ग ही होना चाहिऐ ‘पुराणम्’ नहीं।

सभी सभासदों ने विशुद्धानन्द जी की बात का समर्थन करते हुऐ कहा – “यह पाठ साधु नहीं है”।

स्वामी विशुद्धानन्द जी के इस कथन पर स्वामी दयानंद आत्मविश्वास से गरजते हुऐ बोले-

स्वामी दयानंद :~ “इतिहासपुराणः” इत्येवमेव पाठः इति।
चोचेत् मत्पराजयः, अन्यथा युष्माकं पराजय इति लिख्यताम्।

अर्थात् ‘इतिहासपुराणः’ यही पाठ है। यदि ‘इतिहासः पुराणम्’ निकल आवे तो मेरी पराजय।
यदि ऐसा न निकले तो आप लोगों की पराजय- इसे लिख लो।

आत्मविश्वास से परिपूर्ण उनकी यह अन्तिम उद्घोषणा थी।

इस पर माधवाचारी जी ने शतपथब्राह्मण के अश्वमेध प्रकरण का वह अंश दिखलाया जिसका अन्तिम अंश है-

  "तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति।
   किञ्चित्                 पुराणमाचक्षीत।
   एवमेवाध्वर्युः                  सम्प्रेषयति।
   न          प्रक्रमान्                 जुहोति।

‘पुराणं वेदः’ इस पाठ को देखकर दयानंद स्वामी ग्रन्थ का पन्ना अपने हाथ में लेकर उलट-पुलट कर बहुत देर तक देखते हुए मौन होकर लौटा दिऐ।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पराजय स्वीकार की।

यह ऐतिहासिक शास्त्रार्थ यहीं पूर्ण हो गया।

क्रमशः ••••••••••••••


हर हर महादेव।

লিঙ্গবৈষম্য ও সার্বজনীন দুর্গোৎসব – সুরভি ঝা

লিঙ্গবৈষম্য ও সার্বজনীন দুর্গোৎসব - সুরভি ঝা

পূজো আমার, পূজো তোমার, পূজো সবার। কারণ দুর্গাপূজো বাঙালির শ্রেষ্ঠ পূজো। একবিংশ শতাব্দীতে দাঁড়িয়ে যে প্রশ্ন মাথায় আসে তা হলো সত্যিই কি পূজোর বেদী সবাই কে সমানভাবেই আহ্বান জানায়? বেদীর উপর রাজ করতে দেখা যায় পুরোহিত মশাইদের। তারপর যাদের পূজো তাদের আভিজাত্য ঝলমল করে। পুরুষ লিঙ্গ আয়োজন করে, স্ত্রী- লিঙ্গ জোগাড় করার সাথে সাথে আবার দশভূজা হয়ে বাকিটুকুও সামলে নেয়। মা দূর্গার দশভূজা হ‌ওয়ার ক্ষমতাকে যেইভাবে আমরা মহিমান্বিত করি, মহিলাদের এই সমস্ত কাজ সামলানোর প্রথাকেও আমরা এক‌ইভাবে বাহবা দিয়ে থাকি। এরপরে আসে আর এক লিঙ্গের পূজো, রুপান্তরকামীদের পূজো। তারা বেদীর ঠিক কোন জায়গায় থাকে? আরতি হাতে নিয়ে থাকে? না ঘন্টা বাজায়? না মালা গাঁথে? জানা নেই।কোলকাতায় রঞ্জিতা সিনহা নিজ বাসভবনে অর্ধনারীশ্বর মূর্তি পূজা করে। কারণ সেটি রূপান্তরকামী সত্ত্বার প্রতিফলন। মানসিক ভাবে তারা স্ত্রীসুলভ, শারীরিকভাবে তারা পুরুষালী। মূর্তি গড়ে তারা নিজেরাই, কুমোরটুলির শিল্পীদের আদোলে। নিজেদেরই আয়োজনে, ও ফান্ডে অনুষ্ঠিত হয় তাদের পূজো। নারীর শরীর তার নারীত্বের জন্য শিকার পুরুষালী চাহিদার কাছে। এই দুই লিঙ্গের এক দেহে বিচরণ সেই দেহটিকে ঘাবড়ে দেয় সবথেকে বেশি। কিন্তু মনুষ্যোচিত বৈশিষ্ট্য থেকে ভ্রষ্ট(ডিহিউম্যানাইজ)করে না কোন ভাবেই। তা না জানায় অথবা জানার বিষয়ের মধ্যেই না রাখার কারণে পুরুষ ও স্ত্রী লিঙ্গের পরের জায়গাটা ফর্মে “আদার” হিসেবে পেলেও পূজো মণ্ডপে দেখা যায় না তাদের। মেয়ের সাজে এসেও পুরুষের আওয়াজ এলিয়েন-সম গড়ে তোলে তাদের। বন্ধু বান্ধবীর দলে স্থান হয় না তাদের।মায়ের মূর্তিকে কুমোরটুলি বানায় নারীর যথাযথ শারীরিক মাপ ও পুরুষালি দৃকপাত অনুযায়ী। মা দূর্গার নারীশক্তির প্রতীক তখনই হয়ে ওঠে যখন তার রোষে অরাজকতার মৃত্যু হয়। যখন পুরুষের অন্ডকোষে তৃপ্তি জাগানো নারীটিকে সে বশ করতে পারে না চিরাচরিত রীতি অনুসারে। যাকে বশ করা যায় না, তাকে সমাজ বরণ করে না। দূর্গাবরণ তখন হয় যখন সে সম্পূর্ণ মাটির প্রতিমা- ধীর ও শান্ত। ইংরেজিতে রুপান্তরকামীদের আমরা ‘ট্রান্সজেন্ডার’ বলে থাকি। ‘ট্রান্স’ অর্থাৎ ‘বিয়ন্ড’, অর্থাৎ অতিক্রম করে। ‘জেন্ডার’ বলতে বোঝায় সেই শরীরটিকে যাকে সমাজ তার মতোন করে গঠন করতে চায়, জীবতাত্ত্বিক পার্থক্যের বাইরে গিয়ে। ‘ট্রান্সজেন্ডার’ কথাটির মানে তাই সামাজিক বাঁধনের উর্ধ্বে গিয়ে জুডিথ বাটলারের ‘পারফরম্যান্স’ এর ভিত্তিতে গড়ে ওঠে যেই লিঙ্গ। সাইমন দি বিউভয়ার এর মতানুযায়ী নারীর অবস্থান সমাজে ‘আগন্তুক’ এর মতন। সভ্যতা পুরুষোচিত। এই সমাজে ট্রান্সজেন্ডারের অবস্থান সুতরাং আরও প্রান্তিক। যার পূজোর মণ্ডপে স্বাধীনভাবে ঘুরে বেড়ানোর অধিকার নেই। পূজোর এই সার্বজনীনতা নিয়ে তাই প্রশ্ন ওঠে বারংবার!  পূজোর আনন্দ কী প্রকৃতই সবার সামর্থ্যৈর মধ্যে পড়ে? লিঙ্গের পরিচয় দুর্গা পূজোর উদযাপনকে নির্ধারণ করে যেখানে, সেখানে মা দূর্গার সার্বজনীনতা প্রশ্নাতীত কখোনো হতে পারে না। সুতরাং দুর্গোৎসব সার্বজনীন করার দায়িত্ব কিন্তু আমাদের সকলের। শত্রুতা থাক কোভিডের সাথে, নির্দিষ্ট লিঙ্গের সাথে নয়। যাতে সত্যিই পুজো সবার হতে পারে এই চেষ্টা আমাদের থাকুক।

লেখিকার পরিচয়:

সুরভি ঝা বর্তমানে রায়গঞ্জ বিশ্ববিদ্যালয়ের গবেষক। তার নিজস্ব সংস্থার মাধ্যমে বিভিন্ন সামাজিক কাজের সঙ্গে জড়িত।

नवरात्रि विशेष : नवरात्र का रहष्य

नवरात्रि विशेष : नवरात्र का रहष्य - शिव प्रसाद त्रिपाठी

चान्द्रमास के अनुसार चार नवरात्र होते है –  आषाढ शुक्लपक्ष मे आषाढी नवरात्र , आश्विन शुक्लपक्ष मेँ शारदीय नवरात्र , माघशुक्ल पक्ष मेँ शिशिर नवरात्र एवं चैत्र शुक्ल पक्ष मे बासिन्तक नवरात्र । तथापि परंपरा से दो नवरात्र – चैत्र एवं आश्विन  मास मे सर्वमान्य है ।

 चैत्रमास मधुमास एवं आश्विनमास ऊर्ज मास नाम से प्रसिद्ध है जो शक्ति के पर्याय है। अतः शक्ति आराधना हेतु इस काल खण्ड को नवरात्र शब्द से सम्बोधित किया गया है। नवानां रात्रीणां समाहारः अर्थात् नौ रात्रियो का समूह । रात्रि का तात्पर्य है विश्रामदात्री , सुखदात्री के साथ एक अर्थ जगदम्बा भी है।

रात्रिरुपयतो देवी दिवरुपो महेश्वरः तंत्रग्रन्थोँ मेँ तीन रात्रि  कालरात्रि (महाशिवरात्रि ) फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी महाकाली की रात्रि , मोहरात्रि आश्विन शुक्लपक्ष अष्टमी महासरस्वती की रात्रि , महारात्रि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावश्या महालक्ष्मी की रात्रि ।

एक अंक से सृष्टि का आरम्भ है । सम्पूर्ण मायिक सृष्टि का विस्तार आठ अंक तक ही है। इससे परे ब्रह्म है जो नौ अंक का प्रतिनिधित्व करता है .अस्तु नवमी तिथि के आगमन पर शिव शक्ति का मिलन होता है । 

शक्ति सहित शक्तिमान को प्राप्त करने हेतु भक्त को नवधा भक्ति का आश्रय लेना पडता है , जीवात्मा नौ द्वार वाले पुर(शरीर) का स्वामी है – नवछिद्रमयो देहः . इन छिद्रो को पार करता हुआ जीव ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। अतः नवरात्र की प्रत्येक तिथि के लिए कुछ साधन ज्ञानियो द्वारा नियत किये गये है।

प्रतिपदा – इसे शुभेच्छा कहते है । जो प्रेम जगाती है प्रेम बिना सब साधन व्यर्थ है , अस्तु प्रेम को अबिचल अडिग बनाने हेतु शैलपुत्री का आवाहन पूजन किया जाता है । अचल पदार्थो मे पर्वत सर्वाधिक अटल होता है ।

द्वितीया – धैर्यपूर्वक द्वैतबुद्धि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए माँ ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए ।

तृतीया – त्रिगुणातीत (सत , रज ,तम  से परे) होकर माँ चन्द्रघण्टा का पूजन करते हुए मन की चंचलता को बश मेँ करना चाहिए ।

चतुर्थी – अन्तःकरण चतुष्टय मन ,बुद्धि , चित्त एवं अहंकार का त्याग करते हुए मन, बुद्धि को कूष्माण्डा देवी के चरणोँ मेँ अर्पित करेँ ।

पंचमी – इन्द्रियो के पाँच विषयो अर्थात् शब्द रुप रस गन्ध स्पर्श का त्याग करते हुए स्कन्दमाता का ध्यान करेँ ।

षष्ठी – काम क्रोध मद मोह लोभ एवं मात्सर्य का परित्याग करके कात्यायनी देवी का ध्यान करे ।

सप्तमी – रक्त , रस माँस मेदा अस्थि मज्जा एवं शुक्र इन सप्त धातुओ से निर्मित क्षण भंगुर दुर्लभ मानव देह को सार्थक करने के लिए कालरात्रि देवी की आराधना करेँ ।

अष्टमी – ब्रह्म की अष्टधा प्रकृति पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि एवं अहंकार से परे महागौरी के स्वरुप का ध्यान करता हुआ ब्रह्म से एकाकार होने की प्रार्थना करे ।

नवमी – माँ सिद्धिदात्री की आराधना से नवद्वार वाले शरीर की प्राप्ति को धन्य बनाता हुआ आत्मस्थ हो जाय ।

पौराणिक दृष्टि से आठ लोकमाताएँ  हैं तथा तन्त्रग्रन्थोँ मेँ आठ शक्तियाँ है।

1 ब्राह्मी – सृष्टिक्रिया प्रकाशित करती है ।

2 माहेश्वरी – यह प्रलय शक्ति है ।

3 कौमारी – आसुरी वृत्तियोँ का दमन करके दैवीय गुणोँ की रक्षा करती है ।

4 वैष्णवी – सृष्टि का पालन करती है ।

5 वाराही – आधार शक्ति है इसे काल शक्ति कहते है ।

6 नारसिंही – ये ब्रह्म विद्या के रुप मेँ ज्ञान को प्रकाशित करती है

7 ऐन्द्री – ये विद्युत शक्ति के रुप मेँ जीव के कर्मो को प्रकाशित करती है ।

8 चामुण्डा – पृवृत्ति (चण्ड) निवृत्ति (मुण्ड) का विनाश करने वाली है ।

 आठ आसुरी शक्तियाँ –

1 मोह – महिषासुर

2 काम – रक्तबीज

3 क्रोध – धूम्रलोचन

4 लोभ – सुग्रीव

5 मद मात्सर्य – चण्ड मुण्ड

6 राग द्वेष – मधु कैटभ

 7 ममता – निशुम्भ

8 अहंकार – शुम्भ

अष्टमी तिथि तक इन दुगुर्णो रुपी दैत्यो का संहार करके नवमी तिथि को प्रकृति पुरुष का एकाकार होना ही नवरात्र का आध्यात्मिक रहस्य है । नौ ही क्यो ?

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।

अहंकार इतीयं मे प्रकृतिरष्टधा ।

कहकर भगवान ने आठ प्रकृतियोँ का प्रतिपादन किया है। इनसे परे केवल ब्रह्म ही है अर्थात् आठ प्रकृति एवं एक ब्रह्म ये नौ हुए जो परिपूर्णतम है।

नौ देवियाँ , शरीर के नौ छिद्र , नवधा भक्ति ,नवरात्र ये सभी पूर्ण हैँ। नौ के अतिरिक्त संसार मे कुछ नहीँ है इसके अतिरिक्त जो है वह शून्य (0) है । इसीलिए तुलसी जी ने नौ दोहो चौपाईयो मे नाम वन्दना की है। किसी भी अंक को नौ से गुणाकरने पर गुणन फलका योग नौ ही होता है। अतः नौ ही परिपूर्ण है।              

नौ दिन कैसे करें कन्या-पूजन

नौ दिन कैसे करें कन्या-पूजन - शिव प्रसाद त्रिपाठी

नवरात्रि –बालिकाओं को प्रसन्न करने का पर्व। नवरात्रि यानी सौन्दर्य के मुखरित होने का पर्व। नवरात्रि यानी उमंग से खिल-खिल जाने का पर्व।

नौ दिनों तक दैवीय शक्ति मनुष्य लोक के भ्रमण के लिए आती है। इन दिनों की गई उपासना-आराधना से देवी भक्तों पर प्रसन्न होती है। लेकिन पुराणों में वर्णित है कि मात्र श्लोक-मंत्र-उपवास और हवन से देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

इन दिनों २ से लेकर ५ वर्ष तक की नन्ही कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व है। नौ दिनों तक इन नन्ही कन्याओं को सुंदर उपहार देकर इनका दिल जीता जा सकता है। इनके माध्यम से नवदुर्गा को भी प्रसन्न किया जा सकता है। पुराणों की दृष्टि से नौ दिनों तक कन्याओं को एक विशेष प्रकार की भेंट देना शुभ होता है।

प्रथम दिन  – “फूल” की भेंट देना शुभ होता है। साथ में कोई एक श्रृंगार सामग्री अवश्य दें। अगर आप माँ “सरस्वती” को प्रसन्न करना चाहते है तो “श्वेत फूल” अर्पित करें। अगर आपके दिल में कोई “भौतिक कामना” है तो “लाल पुष्प”देकर इन्हें खुश करें। (उदाहरण के लिए : गुलाब, चंपा, मोगरा,गेंदा, गुड़हल)

दूसरे दिन –  “फल” देकर इनका पूजन करें। यह फल भी सांसारिक कामना के लिए लाल अथवा पीला और वैराग्य की प्राप्ति के लिए केला या श्रीफल हो सकता है। याद रखें कि फल खट्टे ना हो।

तीसरे दिन-“’मिठाई” का महत्व होता है। इस दिन अगर हाथ की बनी खीर, हलवा या केशरिया चावल बना कर खिलाए जाएँ तो देवी प्रसन्न होती है।

चौथे दिन- “वस्त्र” देने का महत्व है लेकिन सामर्थ्य अनुसार रूमाल या रंग बिरंगे फीते दिए जा सकते हैं।

पाँचवे दिन – देवी से सौभाग्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्याओं को पाँच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है। इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहँदी, बालों के लिए कांटे सुगंधित साबुन, काजल, नाखूनी,  पावडर इत्यादि हो सकते हैं।

छठे दिन-  “खेल-सामग्री देना चाहिए”। आजकल बाजार में खेल सामग्री की अनेक प्रकार उपलब्ध है। पहले यह रिवाज पाँचे, रस्सी और छोटे-मोटे खिलौनों तक सीमित था। अब तो ढेर सारे विकल्प मौजूद है।

सातवें दिन- “माँ सरस्वती” के आह्वान का होता है। अत: इस दिन कन्याओं को “शिक्षण सामग्री” दी जानी चाहिए। आजकल बाजार में विभिन्न प्रकार के पेन, पेंसिल, कॉपी, ड्रॉईंग बुक्स, कंपास, वाटर बॉटल, लंच बॉक्स उपलब्ध है।

आठवें दिन- नवरात्रि का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन अगर कन्या का अपने हाथों से श्रृंगार किया जाए तो देवी विशेष आशीर्वाद देती है। इस दिन कन्या के  पैर दूध से पूजने चाहिए। पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए। इस दिन कन्या को भोजन कराना चाहिए और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट देनी चाहिए। हर दिन कन्या-पूजन में दक्षिणा अवश्य दें।

नौवें यानी नवदुर्गा के अंतिम दिन  – खीर,ग्वारफली की सब्जी और दूध में गूँथी पूरियाँ कन्या को खिलानी चाहिए। उसके पैरों में महावर और हाथों में मेहँदी लगाने से देवी पूजा संपूर्ण होती है। अगर आपने घर पर हवन का आयोजन किया है तो उनके नन्हे हाथों से उसमें समिधा अवश्य डलवाएँ। उसे इलायची और पान का सेवन कराएँ।इस परम्परा के पीछे मान्यता है कि देवी जब  अपने लोक जाती है तो उसे घर की कन्या की तरह ही बिदा किया जाना चाहिए।

अगर सामर्थ्य हो तो नौवें दिन लाल चुनर कन्याओं को भेंट में दें। उन्हें दुर्गा चालीसा की छोटी पुस्तकें भेंट करें। गरबा के डाँडिए और चनिया-चोली भी दिए जा सकते हैं। बालिकाओं से घर में गरबे करवाने से भी देवी प्रसन्न होती है। इन सारी रीतियों के अनुसार पूजन करने से देवी प्रसन्न होकर वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि, यश, वैभव, कीर्ति और सौभाग्य का वरदान देती है।

नवरात्र में किस आयु की कन्या के पूजन से मिलता है कैसा फल—— पूजन के लिए सबसे पहले 9 कन्याओं पर मां का पवित्र जल छिड़कें और उनका पूजन कर भोजन कराएं। भोजन के बाद चरण स्पर्श कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें।

प्रथम दिवस—– दो वर्ष की कन्या के पूजन से दुखों का नाश होता है।

द्वितीय दिवस— तीन वर्ष की कन्या साक्षात त्रिमूर्ति का स्वरूप है। इससे अन्न-धन में बढ़ोतरी होती है।

तृतीय दिवस—  चार वर्ष की कन्या का पूजन करने से परिवार का कल्याण होता है, जीवन में शुभ समाचार मिलते हैं।

चतुर्थ दिवस—-  पांच वर्ष की कन्या के पूजन से रोगों से मुक्ति मिलती है।

पंचम दिवस—  छह वर्ष की कन्या का पूजन साक्षात मां काली का पूजन है। इससे विद्या और यश की प्राप्ति होती है।

षष्ठम दिवस—- सात वर्ष की कन्या मां चंडिका का रूप है। इससे बाधाओं का निवारण होता है।

सप्तम दिवस—- आठ वर्ष की कन्या का पूजन संकट से रक्षा करता है।

अष्टम दिवस—- नौ वर्ष की कन्या के पूजन से असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी सफल हो जाते हैं।

नवम दिवस—- दस वर्ष की कन्या का पूजन जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है। इससे मां अपने भक्त के समस्त मनोरथ पूर्ण करती है

গৌড়ীয় বৈষ্ণব নারী

গৌড়ীয় বৈষ্ণব নারী - অরিন্দম সরকার

“মধ্যযুগ” বললেই আমাদের কানে বেজে ওঠে একটি বহুশ্রুত শব্দবন্ধ : “মধ্যযুগীয় বর্বরতা”। অবচেতনেই আমরা মধ্যযুগের সাথে “বর্বরতা”, “অশিক্ষা”,” অবক্ষয়” প্রভৃতি অন্ধকার দিকগুলিকে সমার্থক করে ফেলেছি। এটি অমূলকও নয়। মধ্যযুগে সার্বিক সমাজজীবন বিশেষতঃ নারীর অবস্থান ও অধিকার গভীর অবক্ষয়ের সম্মুখীন হয়েছিল। নারী স্বাধীনতা বা প্রগতিশীলতা তো দূর; একদিকে বাল্য বিবাহ, পর্দাপ্রথা, সতীদাহের মত কুপ্রথা; অন্যদিকে অশিক্ষা, কুসংস্কার আর কূপমণ্ডুকতায় স্থবির হয়ে উঠেছিল সাধারণ নারীজীবন। কিন্তু আশ্চর্যজনক ভাবে সেই সময়ে দাঁড়িয়ে বাংলার বৈষ্ণব সমাজের নারীরা সমকালীন সমাজের অন্ধকার দিকগুলির বিপরীতে হেঁটে ব্যতিক্রমী নজির গড়েছিলেন, ভেঙেছিলেন অন্ধসংস্কারের কঠিন নিগড়। সে ইতিহাস পুঙ্খানুপুঙ্খ ভাবে অনুস্যূত হয়েছে বৈষ্ণব সাহিত্যের পরতে পরতে। তারই কিয়দংশ এই প্রবন্ধে আলোচিত হবে। 

মূল আলোচনায় প্রবেশের পূর্বে অতি সংক্ষেপে দেখে নেওয়া যাক প্রাচীন ভারতীয় ধর্মগ্রন্থে নারীর মর্যাদা কীরকম ছিল। ভারতবর্ষে নারীর অবস্থান সুদূর বৈদিক যুগ থেকেই অতি মহিমান্বিত। বেদ এবং বেদানুগ গৃহ্যসূত্র, শ্রৌতসূত্রাদিতে নারীস্বাধীনতা তথা সমানাধিকারের উজ্জ্বল চিত্র দেখা যায়। বৃহদারণ্যক উপনিষদের ৬৷৪৷১৭ (অথ য ইচ্ছেদ্ দুহিতা…) মন্ত্রে বিদুষী কন্যাসন্তান লাভের জন্য তিলোদন ভোজনের কথা বলা হয়েছে। ঋগ্বেদ ১০৷১৫৯৷৩,  ৮৷৩১৷৮ এবং ৬৷৭৫৷৫ মন্ত্রে পুত্র-কন্যা উভয়েরই সমান সমৃদ্ধি ও অধিকারের কথা রয়েছে। গোভিল পরিশিষ্ট শ্রদ্ধা কল্পের কোলকাতা সংস্করণ, পৃঃ ১৮৬, পারস্কর গৃহ্যসূত্র ১৷২১, আশ্বলায়ন গৃহ্যসূত্র ২৷১২৫, আপস্তম্ব গৃহ্যসূত্র ৬৷১২, কাঠক গৃহ্যসূত্র ২৷১-২ মন্ত্রে কন্যাসন্তান লাভের জন্য বিশেষ সংস্কারের কথা বলা হয়েছে। সুতরাং একথা অবিসংবাদিত ভাবে সত্য যে, শ্রুতি ও শ্রৌত সাহিত্য কেবল পুত্রলাভের কথা বলেননি। সেখানে কন্যাও পুত্রের মতোই অভিপ্রেত ও সমাদৃত। মহাভারত ১৩৷১১৷১৪ শ্লোকে অবিবাহিতা নারীর প্রসঙ্গে বলা হয়েছে: “নিত্যং নিবসতে লক্ষ্মীঃ কন্যকাসুপ্রতিষ্ঠিতা”- অর্থাৎ, কন্যার মধ্যে লক্ষ্মী নিত্য বাস করেন। একই কথা বিষ্ণুস্মৃতির ৯৯৷১৪ তেও রয়েছে। রামায়ণ ৬৷১৩৮৷৩৮ ও ৬১ শ্লোকে দেখা যায়, বনবাস থেকে প্রত্যাগত শ্রীরামচন্দ্র সর্বপ্রথম অবিবাহিতা কন্যাদের হাতে অভিষিক্ত হচ্ছেন। অথর্ব বেদ ৯৷৫৷১৮ মন্ত্র: “ব্রহ্মচর্যেণ কন্যা যুবানং বিন্দতে পতিম্” থেকে বোঝা যায়, সেযুগে ছেলেদের সাথে সমান তালে মেয়েরাও ব্রহ্মচর্যাশ্রমে যেতেন, অধ্যয়ন করতেন। রামায়ণেও ৫৷১৫৷৪৮ শ্লোকে সীতাদেবীকে বৈদিক সন্ধ্যা করতে দেখা যায়। পতঞ্জলীর মহাভাষ্যে “কাশকৃৎস্ন” নামক এক বিদুষী নারীর কথা পাওয়া যায়। যিনি মীমাংসা শাস্ত্রে “কাশকৃৎস্নী” নামক একটি ধারা সৃষ্টি করেন। ঋগ্বেদ ১৷১৭৯ সূক্তের দ্রষ্ট্রী লোপামুদ্রা, একইভাবে বিশ্ববারা ৫৷২৮ সূক্তের, নিবাবরী ৯৷৮১৷১১-২০ মন্ত্রের এবং ঘোষা ১০৷৩৯-৪০ সূক্তের দ্রষ্ট্রী। দর্শনশাস্ত্রের মত যুক্তিগ্রাহ্য আলোচনায় বিবাহিত নারীরাও অনুরক্ত ছিলেন। মহর্ষি যাজ্ঞবল্ক্যের পত্নী মৈত্রেয়ীর নাম এক্ষেত্রে উল্লেখযোগ্য। বিদেহরাজ জনকের সভায় যাজ্ঞবল্ক্যের সাথে ব্রহ্মবাদিনী গার্গীর আধ্যাত্মিক আলোচনা বৃহদারণ্যক উপনিষদের একটি মূল প্রতিপাদ্য। ঋগ্বেদ বলছেন, নারীরা পতির সাথেই শুধু নন, একাকীও যজ্ঞ করতেন। “রূদ্রযাগ” এমনিই একটি যজ্ঞ, যেটি কেবল নারীদের দ্বারাই অনুষ্ঠিত হত। স্ত্রী-পুরুষ সমানাধিকারের আরেকটি সুন্দর দৃষ্টান্ত  হল “হারীত ধর্মসূত্রে” ব্রহ্মবাদিনী নারীদের উপনয়নের বিধানও রয়েছে। 

সময় যত এগোতে থাকে ধীরে ধীরে অন্ধকার গ্রাস করতে থাকে সমাজকে। আর নারীরাও তাঁদের মর্যাদাময় আসন থেকে ক্রমশঃ বিচ্যুত হতে থাকেন। এরপর ১৪৮৬ খ্রিস্টাব্দে শ্রীমন্মহাপ্রভু চৈতন্যদেব বঙ্গদেশ অলংকৃত করে শচীগর্ভসিন্ধু থেকে নবদ্বীপের আকাশে মর্ত্যনয়নের গোচরীভূত হন; যাঁর লোকোত্তীর্ণ চমৎকারিত্ব দার্শনিক সিদ্ধান্তসূর্য আর প্রেমচন্দ্রমার যুগপৎ মেলবন্ধনে অচলায়তন সমাজের অন্ধকার দূর করার পাশাপাশি তাপদগ্ধ জনচেতনাকে স্নাত করেছিল মধুর জোছনার স্পর্শে। তিনি প্রেম-পুরুষোত্তম; ঔদার্য আর কারুণ্যের ঘনীভূত প্রকাশমূর্তি। তাঁর প্রচারিত ধর্মদর্শন এত বিশাল, এত গভীর যে এমন কোন সমস্যা নেই যার সমাধান তাঁর ধর্মদর্শন দ্বারা অসম্ভব। যদিও শ্রীমন্মহাপ্রভু পৃথক পৃথকভাবে সমস্ত সমস্যার সমাধান করেননি; তিনি তাঁর অনুগামীদের হৃদয়গ্রাম যে অধ্যাত্মবোধের তার-সপ্তকে বেঁধে দিয়েছিলেন, তা স্বয়ংক্রিয়ভাবেই আত্মমাধুর্যে জগতকে স্নিগ্ধ করেছিল। তাঁর অনুসারী নারীরা কীভাবে সেযুগের পটভূমিকায় দাঁড়িয়েও পুরুষের সমমর্যাদায় অধিষ্ঠিত হতে পেরেছিলেন তা সহজেই বোঝা যায় কিছু দৃষ্টান্তের মাধ্যমে। 

 সাধারণ হিন্দু সমাজে ধারণা আছে যে, স্ত্রীলোকেরা শালগ্রাম শিলা স্পর্শ করতে পারবেন না। অথচ শ্রীমন্মহাপ্রভুর ঘনিষ্ঠ পরিকর শ্রীসনাতন গোস্বামী তথা শ্রীগোপাল ভট্ট গোস্বামী রচিত বৈষ্ণব স্মৃতি “হরিভক্তিবিলাস”-এর পঞ্চম অধ্যায়ে ২২৩-২২৪শ্লোকে নারীদেরকেও শালগ্রামার্চনের অধিকার দেওয়া হয়েছে। “স্ত্রীশূদ্রকর সংস্পর্শো বজ্রাদপি সুদুঃসহ” – অর্থাৎ, স্ত্রীলোক ও শূদ্র শালগ্রাম স্পর্শ করলে তা শিলারূপী বিষ্ণুর শ্রীঅঙ্গে বজ্রপাতের থেকেও কঠিন আঘাত দেয়- এই বাক্যকে খণ্ডন করে “হরিভক্তিবিলাস”-এর “দিগ্-দর্শিনী” টীকায় শ্রীসনাতন গোস্বামী বিভিন্ন শাস্ত্র থেকে একাধিক প্রমাণ উদ্ধার করে দেখিয়েছেন, “দ্বিজৈঃ স্ত্রীভিশ্চ শূদ্রৈশ্চ পূজ্যো ভগবতপরৈঃ” – অর্থাৎ, বৈষ্ণবমাত্রেই শালগ্রাম অর্চনের অধিকারী, তা তিনি স্ত্রীদেহে থাকুন, কিংবা শূদ্রদেহে। কিছু কিছু স্মৃতিশাস্ত্র নারীদের “গুরু” হতে বাধা দিলেও, গৌড়ীয় স্মৃতিকার গোপাল ভট্ট গোস্বামী সেসব নিষেধবাক্যকে “হরিভক্তিবিলাস”-এ গ্রহণ করেননি। পাঁচশো বছর আগে বৃন্দাবনের গোস্বামীবর্গের এ দূরদর্শিতা সত্যিই প্রশংসনীয়।

আর্যজীবন মূলতঃ চারটি আশ্রমে বিভক্ত। এর মধ্যে চতুর্থাশ্রম সন্ন্যাস সর্বাপেক্ষা কঠিন। ঠিক একারণেই সাধারণতঃ নারীদেরকে সন্ন্যাস দান করা হয় না। তাই বলে নারীরা সন্ন্যাসের অযোগ্য নন। স্মৃতিকার গোপাল ভট্ট গোস্বামী তাঁর একটি গ্রন্থে নারীদের সন্ন্যাসের কথা বলেছেন। “সংস্কার দীপিকা” ২১ ও ২২ শ্লোকে নারীদের সন্ন্যাস প্রতিপাদিত হয়েছে। প্রসঙ্গতঃ গৌড়ীয় বৈষ্ণব দর্শন কখনোই নারী পুরুষে ভেদভাব পোষণ করেন না। উভয়েই জীবাত্মা। পার্থক্য কেবল বাহ্য দেহাবরণে। তাই নারীরাও পুরুষদের মতোই ধর্মপ্রচারে নিযুক্তা হতেন। পেতেন নেত্রীপদ। অগণিত স্ত্রী-পুরুষকে বাৎসল্যরসের অমোঘ আকর্ষণে টেনে আনতেন মহাপ্রভুর পতাকাতলে। এই প্রসঙ্গে গৌড়ীয় বৈষ্ণব জগতে যে নারী ব্যক্তিত্ব স্বমহিমায় ভাস্বর তিনি হলেন ঈশ্বরী জাহ্ণবা। তিনি প্রভু নিত্যানন্দের ভার্যা তথা শক্তিস্বরূপিণী। অসংখ্য পদকর্তা নিজেদের পদের ভণিতায় পরম শ্রদ্ধায় এঁর নাম উল্লেখ করেছেন। মহাপ্রভুর অপ্রকটের পর তিনিই হয়ে উঠেছিলেন গৌড়ীয় বৈষ্ণব সমাজের একচ্ছত্র নেত্রী। ঠাকুর নরোত্তম, পদকর্তা জ্ঞানদাস, বৃন্দাবনস্থ শ্রীল রূপ গোস্বামী, সনাতন গোস্বামীর মত নক্ষত্রবৃন্দও শ্রদ্ধায় এঁর সামনে সাষ্টাঙ্গ দন্ডবৎ করতেন। আজকাল দুর্গাপুজায় “নারী পুরোহিত” প্রথার চল হচ্ছে। গৌড়ীয় বৈষ্ণব সমাজে পাঁচশো বছর আগেই এই প্রথার শুরু হয়ে গেছিল। ঈশ্বরী জাহ্ণবা শুধু দীক্ষাদাতা গুর্বী(স্ত্রী গুরু)-ই ছিলেন না; খেতুড়ির কিংবদন্তী বৈষ্ণব সম্মেলনে তিনিই ছিলেন মূল নেত্রী। শুধু খেতুড়ি সম্মেলনেই ইনি ছয় মূর্তি কৃষ্ণ বিগ্রহ প্রতিষ্ঠা করেন, এছাড়াও বহু মন্দির এবং ভগবদ্বিগ্রহ এঁর পৃষ্ঠপোষকতায় ও নেতৃত্বে নির্মিত হয়। বৃন্দাবনে প্রাচীন কৃষ্ণবিগ্রহের বামে শ্রীরাধিকার বিগ্রহ স্থাপন জাহ্ণবা দেবীরই কৃতিত্ব। নিত্যানন্দ তনয় বীরচন্দ্র এঁর শিষ্যত্ব গ্রহণ করেন। অদ্যাবধি গৌড়ীয় বৈষ্ণবগণ পরম শ্রদ্ধায় “জাহ্ণবা দেবী”-র নাম স্মরণ করেন। বৃন্দাবনে শ্রীরাধাকুণ্ডের তটে মা জাহ্ণবার “বৈঠক” স্থাপিত আছে। 

ঈশ্বরী জাহ্ণবার পরেই যে বৈষ্ণব নারীর নাম স্মরণপথে উদিত হয়, তিনি  পঞ্চতত্ত্বের অন্যতম শ্রীঅদ্বৈত আচার্যের সুযোগ্যা পত্নী “সীতাঠাকুরাণী”। স্বামীর প্রকটকালেই তিনি “জগৎ প্রসিদ্ধা আর্যা”। ভক্তবৃন্দের কাছে তিনি “আচার্যানী”। কবিকর্ণপূর গোস্বামী তাঁকে “যোগমায়া” দেবীর অবতার বলেছেন। প্রভু অদ্বৈত আচার্যের মত তিনিও দীক্ষা দিতেন। প্রভু অদ্বৈতের অপ্রকটের পর বৈষ্ণব সমাজ অনেকাংশেই তাঁর ছত্রছায়ায় আশ্রয় নেন। সীতাঠাকুরাণীর জন্মবৃত্তান্তটিও অলৌকিক। পিতা নৃসিংহ ভাদুড়ি পদ্মবনে তাঁকে খুঁজে পান। সাদরে গ্রহণ করে তাঁকে গৃহে নিয়ে আসেন। একইদিনে নৃসিংহ ভাদুড়ির পত্নীও “শ্রীদেবী” নাম্নী একটি কন্যা প্রসব করেন। একইসঙ্গে দুই কন্যা লাভ সস্ত্রীক নৃসিংহ ভাদুড়িকে আনন্দিত করেছিল। দলে দলে লোক এসেছিলেন যমজ কন্যাকে দেখতে। যেখানে  একবিংশ শতকেও “কন্যাভ্রূণ হত্যা”, “কন্যাসন্তানের প্রতি অনীহা” প্রভৃতি বৈষম্যের বিরুদ্ধে প্রচার চালাতে হয়,  সেখানে পাঁচশো বছর আগে বৈষ্ণব সমাজে কন্যাসন্তানের এই সমাদর আমাদের মুগ্ধ করে। 

বৈষ্ণব জগতে নারীর স্থান কত উচ্চে ছিল, তার আরেকটি দৃষ্টান্ত আমরা “চৈতন্যভাগবত”-এর লেখক শ্রীল বৃন্দাবন দাস ঠাকুরের ক্ষেত্রে দেখতে পাই। বৈষ্ণবজগতে ঠাকুর বৃন্দাবন দাস “বেদব্যাস”-এর অবতার বলে পূজিত হন। “চৈতন্যভাগবত”-এর মত এত গুরুত্বপূর্ণ ও বহুমানিত গ্রন্থের রচয়িতা ঠাকুর বৃন্দাবন দাস নিজের পিতা নন, বরং মাতার নামে পরিচয় খ্যাপন করতেন। মহাপ্রভুর ঘনিষ্ঠ পরিকর শ্রীবাস পণ্ডিতের ভ্রাতুষ্পুত্রী ছিলেন নারায়ণী দেবী। শৈশবে শ্রীমন্মহাপ্রভুর কৃপাও পেয়েছিলেন। শ্রীমন্মহাপ্রভুর উচ্ছিষ্ট ভোজন করে বালিকা নারায়ণীর শরীরে অষ্টসাত্ত্বিক বিকারও দেখা দিয়েছিল। চৈতন্যভাগবত”-এর এরূপ বর্ণনা থেকে বোঝা যায় শৈশব থেকেই তিনি পরম ভক্ত ছিলেন। পরবর্তীতে এঁর বিবাহ হয় কুমারহট্ট নিবাসী “বৈকুণ্ঠদাস”-এর সাথে। “প্রেমবিলাস”-কার নিত্যানন্দ দাস জানিয়েছেন, ঠাকুর বৃন্দাবন দাস গর্ভে থাকাকালীন তাঁর পিতা বৈকুণ্ঠদাস পরলোক গমন করেন। যদিও সমগ্র “চৈতন্যভাগবত” -এ কোথাও ঠাকুর বৃন্দাবন দাস স্বীয় পিতার নাম উল্লেখ করেননি। সর্বত্র তিনি “নারায়ণী-পুত্র ” বলেই পরিচয় দিয়েছেন। পাঁচশো বছর পূর্বের এরূপ প্রগতিশীলতা সত্যিই মুগ্ধ করে। 

সেযুগে সাধারণ নারীদের থেকে বৈষ্ণব নারীরা অধিক শিক্ষিতা ও প্রগতিশীলা হতেন। যেমন গৃহকর্মে অত্যন্ত নিপুণা; তেমনি পুরুষদের সাথে কাঁধে কাঁধ মিলিয়ে মহাপ্রভুর বাণী প্রচার করতেন তাঁরা। শ্রীবাস গৃহিণী মালিনী দেবীর কথা এ প্রসঙ্গে বলা যেতে পারে। গৌর-নিত্যানন্দকে তিনি “পুত্র ” রূপে দেখতেন। প্রভুযুগলও তাঁকে “মা” বলে ডাকতেন। বিশেষ করে নিত্যানন্দ প্রভু তাঁর কাছে পুত্রবৎ চাপল্য প্রদর্শন করতেন। কখনো শ্রীবাস গৃহিণীর কোলে মাথা রেখে ঘুমিয়ে পড়তেন, কখনো বা পুত্রভাবে মালিনীর স্তনপান করতেন। মালিনী নিজ হাতে খাইয়ে না দিলে নিত্যানন্দ প্রভু ভোজন করতেন না। চৈতন্যভাগবত গ্রন্থে এর স্পষ্ট ছবি এঁকেছেন ঠাকুর বৃন্দাবন দাস। ভক্তবৃন্দের সাথে শ্রীবাস ঘরণী মালিনীর এই প্রকার বাৎসল্যপ্রীতির আদানপ্রদান প্রমাণ করে বৈষ্ণব গৃহে নারীর অবস্থান কতখানি স্বাধীন ছিল। 

শ্রীবাস পণ্ডিতের গৃহের পরিচারিকা “দুঃখী” শ্রীমন্মহাপ্রভুর কৃপা পেয়েছিলেন। যে যুগের পটভূমিকায় আমরা “দাসদাসী” কেনাবেচার মত ঘৃণ্য প্রথাকে দেখতে পাই, সেযুগে বৈষ্ণব গৃহের এক অখ্যাতা দাসী দুঃখী নিজের অপরিসীম ভক্তির কারণে চৈতন্যজীবনী “চৈতন্যভাগবত” -এর পাতায় ঠাঁই পেয়েছিলেন। শুধু কি তাই? স্বয়ং মহাপ্রভু “দুঃখী”-র নাম পরিবর্তন করে রেখেছিলেন “সুখী”। একে যদি প্রগতিশীলতা না বলি, তবে কাকে বলব ? কোন বিশেষ যোগ্যতা নয়, শিক্ষাদীক্ষা, উচ্চকুল, সামাজিক মর্যাদা কিচ্ছুটি নয়; কেবল অনন্যা ভক্তির বলেই একজন অন্ত্যজ নারীও বৈষ্ণব জগতে কত উচ্চ স্থান পেতে পারতেন তা শ্রীবাস গৃহের পরিচারিকা “দুঃখী”-র উদাহরণ থেকে বোঝা যায়। 

সাধারণতঃ আমরা দেখতে পাই, বিবাহিত দম্পতি  নিঃসন্তান হলে লোকসমাজ তাঁদের খারাপ চোখে দেখে। বিশেষতঃ সন্তান না হওয়াটিকে স্ত্রীলোকের অক্ষমতা মনে করে স্ত্রীটিকে নানা লাঞ্ছনা প্রদান করে; তাঁকে অমঙ্গলের চিহ্ন রূপে দেখা হয়, কোনপ্রকার শুভকার্যে তাঁর যোগদান নিষিদ্ধ হয়ে যায়। অথচ বৈষ্ণব জগতে নিঃসন্তান স্ত্রীলোক শুধু যথাযোগ্য মর্যাদাই নয়, আচার্যের ভূমিকায় অবতীর্ণ হতেও পারতেন। মহাপ্রভুর মাসিমাতা “সর্বজয়া দেবী” নিঃসন্তান ছিলেন। নিত্যানন্দ ঘরণী জাহ্ণবা, শ্রীনিবাস আচার্যের দুহিতা হেমলতা ঠাকুরাণীও এ প্রসঙ্গে উল্লেখযোগ্য নাম। এঁরা নিঃসন্তান হলেও বৈষ্ণব জগতে উচ্চ স্থান লাভ করেছিলেন। শ্রীনিবাস দুহিতা হেমলতা ঠাকুরাণীও ছিলেন অত্যন্ত তেজস্বিনী বৈষ্ণব নারী।

   মহাপ্রভুর পরম অন্তরঙ্গ সাড়ে তিনজন পার্ষদের মধ্যে অর্ধজন ছিলেন শিখী মাহিতীর ভগিনী বৃদ্ধা মাধবীদেবী। পরম তপস্বিনী, উচ্চশিক্ষিতা এই রমণী নিজে পদরচনা করতেন। গৌরলীলা বিষয়ক এঁর কয়েকটি পদ “পদকল্পতরু ” গ্রন্থে সংকলিত হয়েছে। অনন্যা ভক্তির কারণে ইনি বৈষ্ণব সমাজে “অর্ধপুরুষ” রূপে বিবেচিত হতেন। “সংস্কার দীপিকা”-য় এঁর দৃষ্টান্ত দিয়েই গোপাল ভট্ট গোস্বামীপাদ স্ত্রীদেরও সন্ন্যাস আশ্রমের অধিকার প্রদান করেছেন। কবিকর্ণপূর গোস্বামী এঁকে “কলাকেলী” মঞ্জরী বলেছেন। কারো মতে ইনি অবিবাহিতা ছিলেন, আবার কেউ কেউ এঁকে বিধবা বলেছেন। একাধিক উদাহরণ থেকে দেখা যায়, বৈষ্ণব জগতে “সতীদাহ ” প্রথা প্রচলিত ছিল না। মহাপ্রভুর অপ্রকটের পর বিষ্ণুপ্রিয়া দেবী দীর্ঘকাল প্রকট ছিলেন। প্রভু নিত্যানন্দের অপ্রকটের পর তদীয় শক্তি শ্রীজাহ্ণবা অথবা অদ্বৈত প্রভুর অপ্রকটের পর সীতাঠাকুরাণী, রাঘব-ভগিনী দময়ন্তীর নাম এক্ষেত্রে বিশেষভাবে উল্লেখযোগ্য। 

গৌড়ীয় বৈষ্ণব আন্দোলন সমাজের সর্বক্ষেত্রেই স্বীয় প্রভাব বিস্তার করেছিল। মহাপ্রভুর অন্যতম প্রিয়ভক্ত ঠাকুর হরিদাসের প্রভাবে দেহোপজীবী পতিতা লক্ষহীরা পরম শ্রদ্ধেয় বৈষ্ণবে রূপান্তরিত হয়েছিলেন। ঠাকুর হরিদাসের মুখে নামসংকীর্তন শুনে তাঁর ভাবান্তর ঘটেছিল। রামচন্দ্র খাঁর ব্যবস্থায় এই অসামান্যা রূপবতী  লক্ষহীরা ঠাকুর হরিদাসের বৈরাগ্য ব্রত ভঙ্গ করার জন্য গভীর রাতে যাঁর কুটীয়ার কাছে এসে তাঁকে প্রলোভিত করার চেষ্টা করেন। তিনদিন তিনরাত্রি চেষ্টা করেও ঠাকুর হরিদাসকে টলাতে না পেরে তাঁর চিত্ত পরিবর্তিত হয়। তীব্র আত্মদহন আর সাধনার প্রভাবে তিনি একসময় “পরম মোহান্তী” পদ লাভ করেন। 

   গৌড়ীয় বৈষ্ণব দর্শন ও ধর্মগোষ্ঠী আজ থেকে পাঁচশো বছর আগেও যে কতখানি ঔদার্যের দৃষ্টান্ত স্থাপন করেছিল তা বোঝা যাবে সীতাঠাকুরাণীর দুই “বিশেষ” শিষ্যা “নন্দিনী” এবং “জঙ্গলী” -র কথা আলোচনা করলে। এঁদের বিশেষত্ব হল, এঁরা প্রথমজীবনে ছিলেন পুরুষ, পরবর্তীতে লিঙ্গ পরিবর্তনের মাধ্যমে নারী শরীর লাভ করেন (সূত্র: অদ্বৈতমঙ্গল)। ভজনবলে অনেক যোগসিদ্ধি এঁদের করায়ত্ত হয়েছিল। এঁরা এঁদের সামনে থাকা মানুষের মনের ভাব বুঝে যোগবলে নারী অথবা পুরুষ রূপ ধারণ করতে পারতেন। নন্দিনীর পূর্বনাম নন্দরাম। হরিপুরের বাসিন্দা; কায়স্থকুলে জন্ম। অদ্বৈতশক্তি সীতাঠাকুরাণী এঁকে দীক্ষা দেন। নাম হয় “নন্দিনীদাসী”। শেষজীবনে ইনি পুরীতে বাস করেন। সেখানে এঁর ভজনস্থলী “নন্দিনী মঠ” নামে পরিচিত। এবার জঙ্গলীর প্রসঙ্গে আসা যাক। বৈষ্ণব কবি নিত্যানন্দ দাস রচিত “প্রেমবিলাস” গ্রন্থের চতুর্দশ অধ্যায়ে জঙ্গলীর কিছু বৃত্তান্ত বর্ণিত হয়েছে। জঙ্গলীপ্রিয়া দেবীর পূর্বনাম “যজ্ঞেশ্বর চক্রবর্তী”। শান্তিপুরের কাছে হরিপুর গ্রামে তিনি বাস করতেন। অদ্বৈত-শক্তি(পত্নী) সীতাঠাকুরাণীর কাছে দীক্ষা নিয়ে তদানীন্তন গৌড়ের কাছে গভীর জঙ্গলে ভজন করতেন। লোকমুখে জঙ্গলীপ্রিয়ার সন্ধান পেয়ে গৌড়ের বাদশা শিকারের ছলনায় জঙ্গলীর ভজনকুটীরের কাছে গিয়ে দেখেন এক সুন্দরী যুবতী আসনে উপবিষ্টা। কামাতুর হয়ে জঙ্গলীর সতীত্বনাশ করতে উদ্যত হন। Columbia University-র গবেষিকা Rebecca J Manring তাঁর “Reconstructing Tradition Advaita Acharya and Gaudiya Vaishnavism at the cusp of the Twentieth Century” গ্রন্থে বলেছেন, “বাদশা জঙ্গলীর বস্ত্রহরণ করতে থাকলে জঙ্গলী নিজগুরু সীতাঠাকুরাণীকে স্মরণ করতে থাকেন। অনন্তবীর্যা সীতাদেবী বস্ত্ররূপ ধারণ করে জঙ্গলীকে আবৃত করে রাখেন। শেষমেশ বাদশা বস্ত্রহরণ করতে পারেন না।” অদ্যাবধি মালদহ জেলায় “জঙ্গলীটোটা” এই ব্যতিক্রমী বৈষ্ণবের স্মারক বহন করছে। 

প্রচারের আড়ালে থাকলেও মহাপ্রভুর প্রথমা পত্নী লক্ষ্মীপ্রিয়া এবং দ্বিতীয়া পত্নী বিষ্ণুপ্রিয়ার নাম বৈষ্ণব জগতে পরম শ্রদ্ধেয়। উভয়েই ছিলেন অসামান্যা রূপবতী এবং গৌরপ্রিয়া। লক্ষ্মীপ্রিয়ার অপ্রকটের পর মহাপ্রভু বিবাহ করেন বিষ্ণুপ্রিয়াকে। পরে মহাপ্রভু সন্ন্যাস গ্রহণ করলে বিষ্ণুপ্রিয়া কঠোর বৈরাগ্যে বাকি জীবন কাটান। 

লক্ষ্মীপ্রিয়ার এক পরম অন্তরঙ্গ সখী ছিলেন “চিত্রলেখা”। মহাপ্রভু পূর্ববঙ্গে অর্থোপার্জনে গমন করলে পতিবিরহবিধুরা লক্ষ্মীপ্রিয়াকে সামলাতেন তিনিই। অপরিসীম সহমর্মিতা ছিল তাঁর। কেউ কেউ তাঁকে লঙ্কাপুরীতে বন্দিনী সীতাদেবীর প্রতি সহানুভূতিশীলা সরমার সাথে তুলনা করেছেন। লক্ষ্মীপ্রিয়ার সংসারের কাজেও হাতে হাতে সাহায্য করতেন চিত্রলেখা। এমনকি লক্ষ্মীপ্রিয়া দেবীর অপ্রকটের পর সখীর দায়িত্ব কাঁধে তুলে গৌরজননী শচীমায়ের সেবাশুশ্রূষাও করতেন। বিষ্ণুপ্রিয়াদেবীরও এরকম এক সখীর কথা পাওয়া যায়, তাঁর নাম কাঞ্চনা। প্রত্যেকেই ছিলেন পরম বৈষ্ণবী।

    মহাপ্রভুর পার্ষদ শ্রীরাঘব পণ্ডিতের বিধবা ভগিনী দময়ন্তী দেবী ছিলেন তাঁর পরমভক্ত। মহাপ্রভুর জন্য পরম আদরে নিজ হাতে তিনি নানা সুস্বাদু ভোগ বানাতেন। মহাপ্রভু সন্ন্যাস নিয়ে নীলাচলে থাকাকালে গৌড়দেশের অগণিত ভক্ত রথযাত্রার পূর্বে নীলাচলে যেতেন। প্রিয় পরিকর রাঘব পণ্ডিত এই সময় প্রাণপ্রিয় মহাপ্রভুর জন্য প্রচুর পরিমাণে খাবার নিয়ে যেতেন। একে “রাঘবের ঝালি” বলা হত। বলাই বাহুল্য দময়ন্তী দেবীই এই ঝালির সমস্ত পদ রান্না করতেন। তাতে থাকতো নানান কাসুন্দি, আচার, মোরব্বা, আমসত্ত্ব, নাড়ু, চূর্ণ প্রভৃতি। গুরুপাক ভোজন করে যদি মহাপ্রভুর হজমে সমস্যা হয়, সেজন্য দিতেন শুকতা। মহাপ্রভুর সারাবছরের খাদ্যসামগ্রী এই দময়ন্তী দেবীই বাংলা থেকে বানিয়ে পাঠাতেন। নিখুঁত কারিগরী, দক্ষতা আর হৃদ্গত প্রেম দিয়ে তিনি এমনভাবে এসব বানাতেন যে একবছরেও সেসব নষ্ট হত না। পাকের গুণ আর পারিপাট্যে এসব অবিকৃত থাকতো। এ থেকে সহজেই অনুমেয় দময়ন্তী একাধারে গৃহকর্মনিপুণা অন্যদিকে গৌরগতপ্রাণ ছিলেন।

   যে নারীচরিত্রের কথা না বললে এই আলোচনা অসম্পূর্ণ থেকে যায়, তিনি পুঁটিয়ার রাজকুমারী শচীদেবী। আজীবন ব্রহ্মচারিণী। পণ্ডিত গদাধর গোস্বামীর প্রশিষ্যা এই মহীয়সী নারী পুরীধামে ভজন করতেন। পরবর্তীতে ইনি “গঙ্গামাতা গোস্বামিনী” নামে পরিচিতা হয়েছিলেন। অদ্যাবধি পুরীতে “গঙ্গামাতা মঠ” বিদ্যমান। পুরীর গজপতি রাজা আর পাণ্ডাদের একটা বড় অংশ এঁর থেকে দীক্ষাগ্রহণ করতেন। মধুর ও সুললিত ভাগবত পাঠের জন্য ইনি বিখ্যাত ছিলেন। ভজনপ্রভাবে অসীম অলৌকিক আধ্যাত্মিক শক্তি অর্জন করছিলেন গঙ্গামাতা গোস্বামিনী।

প্রবন্ধের স্বল্প পরিসরে আলোচনা কেবল কয়েকটি নারীব্যক্তিত্বের মধ্যেই সীমায়িত রাখতে হল। এঁরা ছাড়াও অসংখ্য বৈষ্ণব নারী বাংলার সমাজ অলংকৃত করেছিলেন, বৈষ্ণব সাহিত্যে আমরা যাঁদের দেখতে পাই। সেযুগে দাঁড়িয়ে সমাজ সংসারের সমস্ত স্থবিরতা অতিক্রম করা সহজ কার্য ছিল না। নারীদের পিছনের সারিতে রাখার একটা স্বাভাবিক প্রবণতা সেযুগে দেখা যেত। অথচ বৈষ্ণব সমাজে নারীদের এত উচ্চ অবস্থান দেখে সত্যিই বিস্মিত হতে হয়। যেখানে মেয়ের বিয়ে দিতে না পারলে পিতা হতেন সমাজচ্যুত; সেখানে বৈষ্ণব নারীরা অবলীলায় পারতেন চিরকাল ব্রহ্মচারিণী থেকে মহাপ্রভুর আদর্শে জীবন কাটাতে। এ যেন আমাদের বৈদিক যুগের সেই “গার্গী”, “বাক্” প্রমুখা ব্রহ্মবাদিনী-দের কথা স্মরণ করিয়ে দেয়। শিক্ষাদীক্ষায়, আতিথেয়তা, রন্ধনকলা, বিগ্রহসেবা, বাৎসল্যে বৈষ্ণব নারীরা সাধারণ নারীদের থেকে অনেক এগিয়ে ছিলেন। তাঁরা “আচার্যা” হতে পারতেন, সম্বর্ধনাও পেতেন। “ভক্তিরত্নাকর” গ্রন্থে জাহ্ণবা দেবীর সম্বর্ধনার কথা রয়েছে। অগণিত স্ত্রী-পুরুষের সামনে অবলীলায় শাস্ত্রালোচনা করতে পারতেন। শালগ্রামার্চন থেকে শুরু করে সন্ন্যাস সর্বত্র তাঁদের অবাধ অধিকার ছিল। তবে এত স্বাধীনতা পেয়েও এই সকল বিদুষী বৈষ্ণব নারীরা স্বাধীনতার অপব্যবহার করতেন না। তাঁরা ছিলেন অত্যন্ত সংযমী, পরিশীলা এবং সচ্চরিত্রের অধিকারিণী। বৈষ্ণব সমাজে স্ত্রীলোকের মর্যাদা কোন বিচ্ছিন্ন ঘটনা নয়। জাতিভেদ বিষয়েও বৈষ্ণব সমাজ ছিল অনেক উদার। এই ঔদার্যের শিক্ষাই গৌড়ীয়ার প্রাণপুরুষ মহাপ্রভু শ্রীচৈতন্যের শিক্ষা। পাঁচশো বছর আগে এ অসাধ্য সাধন সম্ভব হয়েছিল মহাপ্রভুর নিখুঁত দর্শনের সুষ্ঠু প্রচার ও প্রসারের ফলে। পাঁচশো বছর পূর্বেই শুধু এই শিক্ষার প্রভাবেই বৈষ্ণব নারীর এই উচ্চ আদর্শ স্থাপিত হয়েছিল। আশা করি, আজ এই একবিংশ শতাব্দীতে, এই নারীপ্রগতিশীলতার যুগে গৌড়ীয় বৈষ্ণব দর্শনের প্রচার ঘটলে সমাজের অনেক অন্ধকার দিক দূর হবে। বৈষ্ণব ভাবচেতনায় যে নারী-আদর্শের উত্থান ঘটবে, তা পুরুষের চোখে নারীর প্রতি লোলুপভাবের অবসান ঘটিয়ে নারীর সনাতন “দেবীরূপের” উন্মোচন ঘটাবে। বাংলার প্রাণপুরুষ শ্রীমন্মহাপ্রভু চৈতন্যদেবের কাছে এইই হোক প্রার্থনা।

তথ্যসূত্র:

১। চৈতন্যভাগবত: ঠাকুর বৃন্দাবন দাস 

২। চৈতন্যচরিতামৃত : কবিরাজ কৃষ্ণদাস গোস্বামী

৩। ভক্তিরত্নাকর: নরহরি চক্রবর্তী ঠাকুর

৪। প্রেমবিলাস : নিত্যানন্দ দাস

৫। গৌরপার্ষদ চরিতাবলী: গৌড়ীয় মিশন, বাগবাজার

৬। গৌড়ীয় বৈষ্ণব জীবন : হরিদাস দাস 

৭। গৌড়ীয় বৈষ্ণব অভিধান: হরিদাস দাস 

৮। হরিভক্তিবিলাস : শ্রীগোপাল ভট্ট গোস্বামী

৯। সংস্কার দীপিকা: শ্রীগোপাল ভট্ট গোস্বামী

১০। The Position of Women in Hindu Civilization: Dr. A.S.Altekar 

১১। Reconstructing Tradition Advaita Acharya and Gaudiya Vaishnavism at the cusp of the Twentieth Century: Rebecca J Manring

১২। শ্রীক্ষেত্র: সুন্দরানন্দ বিদ্যাবিনোদ

মন্দিরের ঈশ্বর

মন্দিরের ঈশ্বর - অভিজিৎ সাহা

সালটা ২০১৮, ওই বছরের প্রায় প্রথমলগ্নে ঘন শীতের পোশাকে এক অনুত্তীর্ণ অভিঞ্জতা আমার হয়েছিল। ভ্রমণের তীব্র তেষ্টা মেটাতে বেড়িয়ে পড়েছিলাম এক প্রত্যন্ত জেলাতে, বীরভূম। প্রায় চার রাত্রি অতিবাহিত করেছিলাম সেখানে। 

প্রকৃতি-পরিবেশের যে অসম্ভব উজ্জলতা মনে হয় সেখানেই গেলে ধরা পড়ে যায়। ধরতে পারা যায় হাতের নাগালে। মন চাইনি সেখান হতে ফিরে আসতে ,শুধু মনে হয়েছিল জন্ম-জন্মান্তর এখানে বাঁসা বেঁধে রই। সবকিছুকে কেমন অনাবৃত, উজার করে ফেলে রেখেছে  চাদরের মতন করে তাদের ওই প্রকৃতি মা- কি রিক্ত, দৃঢ়তা আর শৃঙ্খলের সাথে।

জনসংখ্যা নেহাতই কম কিন্তু সেখানে মনুষ্যের দৌড়াদুউড়ি বেশ ছটফটে লাগছিল। তবে বেশিরভাগ দিনআনা সাধু-সন্ন্যাসী, ভিক্ষাবৃত্ত- অভুক্ত দেখতে পেলাম বেশ জায়গায় মানে রাস্তার ফুটপাতে। তাদের সৌম্যদীপ্ত আকুতি যেন অন্য আরেক মানুষের হৃদয়ে দগ্ধতার পরিচয়ে ভাসিয়ে তোলে।

ফিরে আসার ঠিক গত দিন পূর্বে শৈতপ্রবাহে র স্নিগ্ধায় রওনা হলাম এক মাত্রাহীন প্রভাত গন্ধের খোঁজ নিতে। সেদিন গাড়ি থেকে নেমেই মত্তর’ আমরা কয়েকবন্ধু মিলে ওই গ্রামের নির্মম প্রকৃতির প্রেমিক সাজতে গেছিলাম। বেশ অদূরে, একেবারে লালমাটির প্রান্ত বললেই ভুল নেহাত হবে না। রাঙামাটি, ওই যে দূরের গ্রামের সাথে মিশেছে। সেই পুরানো ছবি মনে করিয়ে দেয় আমাকে, আমাদেরকে -গ্রামের সেই সাদা কালো চেহারার সৌন্দর্যে যে অপরুপ সাজ লুকিয়ে থাকত তা আর বলিবার ভাষা নাই; -যেখানে ছিল গাভী ভর্তি গোয়ালঘর আর পাশে বসে থাকা গাভীর মাতা খড়ের চুনাত চুনাত আওয়াজের সাথে লড়ছে। একমনে, তাঁর ধৈর্য্য অনায়াসে পার করছে। কি বিচিত্র রুপ। কেউ আবার মাথা পূর্ণ শুকনো বৃক্ষের ডাল, খড়ের আঁটি ,গাছ-গাছালির পাতা বহন করিয়া নিজ বাড়ির উদ্দেশ্যে পথ নিয়েছে। বাঁশের বেড়া সাজানো ঘর কোথাও দেখলাম ভেজা মাটি আর খড়েরচাল দিয়ে আলতো বাঁধানো আবাস। যেন এক ঝড়ে পড়ে যেতে চাই সে। কিন্তু রয়ে গেছে কয়েক যুগকে পিছনে ফেলে।…

লোক সমাজ বেশ হারে কম ফলে যানবহনের সংখ্যাও সীমিত, যাত্রীবাহী কয়েকটা বাস আর হাতেগনা পা ভ্যান; তাই এখানে দূষণের পরিমাণও যথেষ্ঠ অল্প, ফলে প্রকৃতি বেশ সবুজে সবুজে উঁকি দিয়ে যায় সেটা বোঝা যায়। ঠিক তখনি ই মনে হয়েছিল আমি, আমরা যদি এ আলোক রম্ভা প্রকৃতির বাসিন্দা হতাম। যদি হতাম মেঘের হাতছানি, প্রতিটা বিকাল যদি এমন মুগ্ধ বাতাসের গভীরতায় শরীল ভাসাতাম ওফঃ কি যে তখন ভালো লাগত, যা যা অনুভূতি পেতাম সবটা লুকিয়ে রাখতাম, একেবারে মনের সতেজ কোঠাগারে।

কোকিলের বীনা বাঁশির সুর, কাঠবিড়ালীর ছুটন্ত গতি, প্রতিটা পাতার ঝলমলে চেহারা,ক্ষীণ উষ্ণ বাদাবনের হলুদ সূর্যমুখী, কৃষ্ণচূড়ার মনবৃত্ত রুপ সব যেন কেড়ে নিয়েছে প্রকৃতির থেকে। কি অপরুপ সবকিছু। এখানেই যেন মিশে গেছে সমস্ত অগুন্তি নির্মলের ভাবার্থ নিয়ে। প্রকৃতি , পরিবেশের সারমর্ম এখানেই মাথা উঁচু করে দাঁড়িয়ে আছে তা দেখলে বেশ বোঝা যায়।

এমন মনভাসানো, খেয়া সাজানো দৃশ্য দেখে কোনভাবেই ওখান দিয়ে আসতে মন চাইছিল না তবুও ফিরতে হল গন্তব্যে; ঠাকুরবাড়িতে, কলেশ্বর। 

প্রবেশ করলাম যথারীতি। প্রথমেই দেখলাম মা- ঠাকুমারা যে যার প্রার্থনা, সংকল্প, পূজা-আরতি নিয়ে গভীর ধৈর্য্যে আছেন মনে হল ঈশ্বর এখুনি ই তাদের সন্মুখে দেখা দিতে আসবেন। তাঁদের ভিন্ন আকুতি তা ভাবিয়ে দেয়। তারপর আমি কিছুটা হাঁটলাম,… বাকি বন্ধুরা দেখলাম দেবতার সহিত সাক্ষাৎ করিতে গেল। আমাকে নিয়ে যেতে চাইছিল কিন্তু আমি অমত দেখালাম। তাই বাইরে থেকে ঠাকুরবাড়ির সৌন্দর্য নিজের হৃদয়ে বেশ সজোড়ে আহুতি করলাম। 

ইশ্বর যেখানে বাস করেন সেই জায়গা কত পবিত্র, কত হৃদয়ে মিশে মনে হয় শান্তির সৌধে বাস করছি বর্তমান নিয়ে আমরা। এত শোর্য , এত মনকে স্নিগ্ধ- শুদ্ধ করে তোলে তা সত্যিই আনন্দের অভিধানে স্বয়ং। মন্দিরের চারিপাশ যেন সবুজের অত্যাচারে টইটুম্বুর। কি অসম্ভব ছবি ফুটে উঠেছে তা না দেখলে অবিশ্বাস্য মনে হবে। শান্ত , নিরিবিলি এক স্থান। মানুষের ব্যবহার আর কথা বেশ সংযোমী। নূতন মানুষের সমাগম দেখলে ওঁনারা কথা বলতে ভালোবাসে তাও বুঝলাম।

মানুষ কম তাই প্রকৃতির ওপর জোড়-জবস্তি লড়াই হয় না, বিপন্ন হতে হয় না। ভাঙ্গন নেই। যেটুকু আছে তা মানুষ অপেক্ষা অনেক অনেক বেশি। 

মন্দির চত্তরে আবার বেশ কিছুটা চললাম, প্রকৃতির রঙে মাঝি হতে; সামনে দেখিলাম এক মোটা অশত্থ বৃক্ষের তলে বসে আছে জনা পাঁচেক পা দুলুনি শিশু তবে তাদের কথাবার্তা ও শৃঙ্খলা শুনে নাবালিকা বললেও নেহাত ভুল হবে না। তারা যেন একে ওপরের পাশে বসে কি এক গল্প করছে, আর খুব হাসি হাঁসছে। মনে হল এর আগে ওত হাসি হাঁসেনি ওই ফুটন্ত সুন্দরীরা।

আমি তো আর থাকতে পারলাম না ওদের সাথে গল্পে মিশে গেলাম। আমি বললাম তোমাদের গল্পে আমাকে নিতে হবে যে, ওরা হাঁসলো সবাই, আর তাদের মধ্যে কোন এক চম্পা বলে উঠলো কেন আমরা তোমাই নেব? তুমি তো অচেনা! আমি বললাম চেনা হতে অসুবিধা হবে কোথায়? ওরা আবার হাঁসছে। জিঞ্জাসা করলাম তোমাদের নাম কি? ওরা একে একে নাম বলে দিল; আবার চম্পারা(শিশুরা) আমার নাম ও জানতে চাইলো, আমি ও বললাম। তারপর কচি মুখের দিকে তাকিয়ে বললাম তোমরা পড়াশুনা করছো? ওরা উত্তরে বললো হুম করছি তো। আমি বললাম কোন ক্লাস,- আমরা দুজন ফাইভে, ও ফোর-এ আর ওরা দুজনে সিক্সে। আমি বললাম বাবাআ! তোমরা কতদূর পর্যন্ত পড়াশুনা করেছ আমি বাপু ওতো দূরে যেতেই পারিনি! ওরা এই মিথ্যেটা বুঝতে পেরে খুব হাসি হাঁসছিল। যাক্ আমিও ওই মেঘবালিকাদের সাথে অন্তরঙ্গ হৃদয়ে প্রেমের অত্যাচারে মিশে গেলাম।  

সেদিন বারে শুক্রবার ছিল, তাই আমি বললাম স্কুলে যাওনি কেন তোমরা ? ওরা এবার লুকিয়ে লুকিয়ে অভুক্তের জ্বালা অনুধাবন করতে লাগলো। মৃদু হাসি হাঁসলো তবুও আমার প্রশ্নের জবাব এলো না। আমি আর তেমন করে কিছূ বলিনি। বন্ধুদের ডাকাতেই আমি ওমন চাঁদের হাট থেকে বিরতি নিলাম। …

খানিক পরে চম্পাদের একে ওপরের ভালোবাসা আর দেখতে পায়নি! ঠাকুরবাড়িতে আমাদের এক ম্যাডাম ভক্তদের তরে ভোজনের আয়োজন করেছিল সেদিন। তাই পরিবেশনে দেওয়া নেওয়া করতে এগিয়ে গেলাম। কত শত ভক্ত, অভুক্ত, উপবাসে থাকা মানুষের ভীড়ে যেন ঠাসাঠাসি; উৎসব চলছে, মানুষের মুখে মুখে সবাই বলছে আজ ঠাকুরবাড়ির মহৎসব চলছে। আজ আমাদের ভালো দিন। একে একে থালা, বাটি নিয়ে আসছে বাড়ির বাকী লোকের মজুতের জন্যে কিংবা অভুক্ত রাত টাকে কোনোভাবে চালানোর জন্য।

শালপাতার মোড়কে ফ্রায়েড রাইসের সুবাস পেতে পেতে আমার ক্ষুধার্তের মোহ বরং বেড়েই গেল। দিয়েই চলেছি একের পর এক, তারপর যা দেখলাম তা নিজের চোখকে ও বিশ্বাস দিতে পারিনি। দেখলাম সেই বৃক্ষের পা দুলানি চম্পারা পাশাপাশি বসে রয়েছে আমাকে দেখে খুব লজ্জায় পেতে হল। আমি তো ওদের দেখা দিতে চাইনি তবুও কিভাবে আবার দেখা পেলাম! ঈশ্বর রক্ষা করো আমায়।

তারপর হাতের থেকে রাইসের বালতি টা রেখে নিরালায় আশ্রয় নিলাম। একাকী! সেদিন আর চোখের জল কে সামলাতে পারিনি। হৃদয়ের পোড়া তেজস্রী কে বোঝাতেও পারিনি। কি দেখলাম আমি!? ওই চম্পারা অভুক্তের জ্বালা মেটাতে গিয়ে স্কুলের গন্ডী দেখলো না আজ! ওফঃ কত কিছু শেখা হল না, কত বন্ধুর সঙ্গও পেলনা আহা রে , এই বেদনা কোথায় লুকাই? এতটাই ক্ষুধার্ত থাকতে হয় ওদেরকে। কেন এসব অবলীলা চলছে শত শত চম্পাদের সাথে; কেন হচ্ছে ওদের সাথে এসব? সেদিন কষ্ট করে আমিও ওদের থেকে লুকিয়ে গেছিলাম। ওদেরকে জিতিয়ে দেওয়ার জন্যে। হায় রে শিশুমন!– একরক্তি অভুক্ত চম্পাদের পরিণতি এমনই অন্ধকারের ছিল, যা আমাদের চোখ কে সত্যিই দেখতে দেয় না! 

বোঝা যায় না কোন বিপর্যয় গুলি বারে বারে সামনে আসতে থাকবে এবং কতগুলি নিরীহ সত্ত্বা অবিচারেই থেকে যাবে। স্বচ্ছ উত্তরের কাছে আশ্রিত থাকবো, অভুক্তের চম্পা সুন্দরীরা কিভাবে তাদের জীবনের স্বর্ণ, গোলাপি মুহূর্তগুলো অচিরেই শেষ করছে।।

— ”সুন্দর সুধাময় আলোতে আবার কোথাও যেন গরীবের গদি-তে, 

যেখানে হৃদয়, অজস্র সহ্যের, যন্ত্রণার কদম ফুলিতে বাসা বেঁধে বয়….

সেটা কি গরীব কয়? হৃদয় তো ওখানেও রয়।” ……

FROM BALTAL TO AMARNATH

From Baltal to Amarnath - Debi Prasad Tripathy

At 4 o’clock in the morning we got out of the  taxi or might be said the taxi driver left us the place out of the car at a point nearer to the entrance of joji-la-pass on Srinagar- Leh highway. We left Leh yesterday afternoon and from there we are coming here by a hired taxi. When you got down the sky is full of stars the moon of 13th day before full moon is covering its body in the lap of the hill, the lights of the camp of Amarnath pilgrimage at Baltal can be seen below. Myself and my wife were standing on the highway with two suitcases in our hand. wondering how to get from here to Baltal camp or Sonemarg, at that time I could see a light coming from the side of jojila pass.

The car stopped after raising my hand and I requested the driver to take us and he agreed to take us to Baltal camp. It seemed to me like an angel sent by God. Arriving at Baltal, first we went to inside of pilgrim’s camp and found pity conditions of fresh room and latrine, we decided not to stay there but to go Sonemarg for better staying although it was 15 kilometres far from here towards Shrinagar. Moreover the number of passengers in the camp is very low because almost everyone had left the Camp after visiting Amarnath cave. Amarnath Darshan will be closed after full moon, the day after tomorrow. After waiting for a while one taxi coming from Sonemarg vacating its passengers nearer to us. I approached the taxi driver to take us to Sonemarg  and he was agreed. We came from Baltal to Sonemarg .

In the meantime while we waiting for a taxi to come Sonemarg I finished an important task. I found one horse owner who had two horses and approached him for making arrangements for tomorrow’s up and down journey to visit Amarnath cave and he was agreed. He will accompanied us to visit Amarnath Cave and returned to Sonemarg after ‘darshan’ of Ice Lingam. Knowing the actual position of the road from him I was assured that there was no landslide on the road or there is no possibility of such danger because of the rocky mountain. I asked him to meet us at Sonemarg  with our phone number and I also took his phone number for communication. Arriving at Sonemarg I found a place in a hotel next to the tourist bungalow of the Jammu and Kashmir tourism department. Arrangements of the hotel were good, so we decided to stay there after checking the condition of the room. The first thing to do after entering the room with our luggage  was to take a good bath in hot water because we felt very tired due to cold and waking up at last night for the journey we covered from Leh last night. Fatigue was gone after bathing in hot water.

At 9:30 o’clock in the morning the owner of horses came and discussion had with him in presence of the hotel manager about journey to be undertaken for visiting of Amarnath cave tomorrow. We shall leave from here at 4:30 a.m. in the morning and after visiting Amarnath cave we would return back here and after returning here we  would pay the owner of horses a total sum of rupees 3600/- for two horses. I was sure of going but there is no guarantee until we return back tomorrow after seeing ice lingam at Amarnath, but the only hope was that since the number of pilgrimage were almost negligible the horse owner  would surely come. Of course everything  was by the grace of lord Amarnath. We had been receiving blessings from the unseen of that eternal radiant man in every event since dawn. We went to the market and bought two sticks for two of us because those sticks would be the hope of our journey on tomorrow. We felt asleep for an hour after lunch because we did not sleep on yesterday night.

In the afternoon we walked to the Indus river bridge on the way to Baltal, east of  Sonemarg. After standing on the bridge for a while and watching the setting sun beautiful scene, we returned to the market place in the evening. Shops were full of stocks of local handicrafts and warm clothings. After returning from the market we took our dinner and went to bed because we had to get up tomorrow early in the morning and after completing bath before 4.00 o’clock. Excitement in the mind which would go over only after visiting of ice lingam at Amarnath, the latent desire of our mind. That much awaited precious moment would be tomorrow morning.                                      

The next day before 4:30 o’clock in the morning we were ready and the horseman came with scheduled time with two horses. we went out wearing monkey cap, muffler, Sweater, wollen garments, gloves etc. Although it was in the month of July,  but we felt severe cold in the dawn. We took dry food, raisins, logenzes, chewing gum, water bottle, first aid in a bag on the back. We reached Baltal at 5 o’clock in the morning. The height of Baltal  was 9120 ft. There our horsemen waited for a while for other horse riders who would go on the road so that we could go together. We could see two helicopters standing on the helipad. Helicopter passengers lined up outside the barbed wire fence of the helipad. Helicopter service will start shortly after 6:30 p.m. and it would take 10 minutes to go upto Pancho Tarani, five kilometres from Amarnath cave. The morning sky was clear. Only eastern side of the surrounding hill, a glow of aurora light was seen slowly through the pine, fir and birch trees.

Our journey started at 5:45 a.m. with chorus of ‘Joy Baba Amarnath’s joy’. Our mountaineering path was to South East of Baltal. Position of Amarnath cave was to South-east corner. The first two kilometres of the mountaineering road upto Domail was good. Thereafter hills on the left side, river Amarganga on the right side and between hills and river our path was very steep. Occasionally the river currents freeze, there are current flowing through the ice floor. Somewhere again a huge hole in the ice. On the other side of the river, pine, fir trees stood proudly. My wife was sitting on a horse, holding the horse’s briddle. By the side, my horse was going slowly as I fond of trecking on this dangerous, beautiful mountaineering path which had wild beauty. I was going to see the wild mountain beauty on both sides of the trecking path with a bag on my back and holding the stick on my hand. In every 10 minutes gap the helicopter was flying with passengers, but the sound of the helicopter was disturbing calm and quiet feeling of the circumstances. The road was become narrow two to three feet somewhere. We wear slowly crossing that places. About 4 km from Domeil and 1 km before Barari Marg, we reached the highest point of this route and thereafter descending to the bottom.

On the way we did not see any passengers from the opposite direction but from time to time we met army personnel and Jammu and Kashmir police team. In this way they were patrolling for the safety of the passengers. On our way a few passengers like us were going. There were so many slopes in one place that you could not get down on horseback. My wife had to get off her horse and walked down the slope with a stick. After 4 km of Barari Marg, we crossed the Sangam at the foot of Sant Singh top, at an altitude of 13600 feet, i.e. 11 km from Baltal. The river Amarganga was far below the confluence. After going one km from Sangam it was seen that another path had joined from the right side. This route was a conventional ‘Darshan path’ i.e,  Pahelgaon, Chandan badi, Bayuzan or Wabzan, Sheshnag,  Mahagunas paas,  Panchatarani Sangam, a total of 44 km road from Pahelgaum. Amarnath cave was 4 km from here. In other words the road from Pahelgaum to Amarnath cave was 48 kilometres which took 4 to 5 days to complete the tour, whereas you could return to Baltal after visiting Amarnath cave in only day and the road is only 14 km long. From here there is conventional path towards Amarnath cave. In that junction point we met one staff of Medinipur post office, a resident of Kharagpur town, travelling lover, Mr Pradeep Dutta, who was known to me and his companions, who came from Pahelgaum and will return to Baltal.  The number of passengers on road was not very high because no one was willing to take the risk of the last days Darshan i.e, today, except for a few pilgrims like us. We fixed this day or our intention was to visit Sudhalinga on the full moon day. We heard that on the full moon day the Ice lingam would be the highest size in height. Almost the entire path from Sangam was became muddy due to melting ice with soil, grabbles and sand.  We crossed the pool over the Amarganga river.  There was ice on the Amar Ganga river. We crossed the pool and  walked very slowly on the left side of the river with the weight on the stick.  After a while we saw the ever desired Amarnath cave on the hill to the left and passing some distance we saw that there were scattered tents, all of which seemed to be closed. Most of the temporary stores had gone, those who had not yet gone, had all their belongings tied up and they might be living a little later. We went to one makeshift Store and left our backpacks.  There we purchased some dried offerings, mainly dates and raisins for offering to God.  Of course the respect of the heart was the greatest offering.  Our horsemen going first because he was our guide for visiting Sudhalingam. Then we had to cross 150 steps. At the steps of the stairs and at the top of the cave army soldiers standing with automatic fire arms in their hand to protect pilgrims from any militant subbotage. We had to go up the stairs on the left side of the cave and went down on the right side. The thought of visiting Sudha lingam inside the cave had inspired me and encouraged my wife also. I was slowly getting up to keep pace with her. Finally the hundred fifty steps of the stairs were completed. Inside the enclosure with the railing in front, we saw one seven and half feet high ice cubit. Such a large size ice lingam was not commonly seen but we were lucky to see that. To the right of Amarnath sudha lingam there were two more ice lingam shaped statues. In the middle little one was called Ganesh and the last one on the right was called Parvati. They were smaller in height than Amarnath ice lingam. The cave was at 13500 feet height, 50 feet long, 60 feet wide and 45 feet height. To the left of the cave was the solid, bright, slightly bluish colour of Amarnath ice lingam. By ringing the bell in front, pilgrims were informing Amarnath that despite hundreds of obstacles they had come to pay homage from the core of their heart to him, forgetting the hardships of the journey. The two feet high round Yoni Peeth was about 8 feet size which in front of Amarnath Icelingam, where we were standing.  There was not much of crowd, might be 20 or 25 pilgrims. The soldiers were not restricting or pushing away the visiting pilgrims. There was no need to control the pilgrims crowd. Standing in front of that Ice Lingam, I was forgetting everything, only I was  looking that Ice Lingam. Next to Ice lingam there was a steel rod wrapped in silver foil, blessed by Hara Parvati. While standing in front of Amarnath I remembered the myth of Amarnath.                        

One day Devarshi Narad, the son of Brahma, went to Kailash peak and saw mother Parvati sitting alone. Narad said to mother Parvati “only Mahadev in the three tired world knows the main secret of the creation of the universe. Did not he tell you that story?  whoever heard that story will attain immortality”.  Telling this Narad went away to ‘Vishnu lok’, God Vishnu’s residence. When Shiva returned to Kailash, mother Parvati begged Shiva to speak her that immortal story. Shiva said “immortal story are secret.  If you want to hear that immortal story you have to go to a secret place and listen so that no one but you can hear and know”.  Parvati wanted to know about the secret place where she would hear immortal story. Shiva said “there is a wonderful cave in the Himalayas which no one in the three-tier world knows about it. If one sits there and speaks, no one else can hear or know”.  Parvati agreed to go there. Shiva and Parvati both came to that cave. Before saying immortal story Shiva reminded Parvati “let her not fall asleep while listening to immortal story. when she falls asleep shiva will stop telling story. Parvati has to give sign by saying ‘hun’ for not sleeping and confirm her listening”.  Mahadev closes his eyes and began to speak of the immortality of the original mystery of the creation of the ‘Naradiya Sukta’ of Rigveda. Days go by, nights go by, months go by, finally one day after speaking immortal story in complete, Mahadev open his eyes and saw mother Parvati asleep and unconscious. He wondered who had heard the story and made response by saying ‘hun’ for so long. At last he saw a ‘Sukh Pakhi’ in one corner of the cave, who heard the story and confirm by saying ‘hun’. Mahadev became angry and chased the Sukh Pakhi with his trident to kill him because he had broken his faith. Frightened, the Sukh Pakhi began to flee over the mountains, forest and rivers and the angry Mahadev ran after him with his trident. This bird was the lilac of the sphere. After Radha Krishna descended to earth, in absence of Shri Krishna, shuk Pakhi came to this cave one day while trying in search of lord Krishna. when Shiva was telling to mother Parvathi about immortality, Shuk Pakhi imitated mother Parvathi’s voice and responded by saying ‘hun’. The Sukh Pakhi flew in fear and reached the ashrama of Vyasdeva on the banks of the river Saraswati at Badrikashram. At that time, Batika devi, wife of Vyasdeva, bathed in the river Saraswati and raised a hymn after bowing to the sun.  With the gap in his mouth this Shuk Pakhi enter her body through her throat in a subtle way. Mahadev was happy to see this bird because of his desire to acquire knowledge and endurance, blessed Batika Devi and said ” this Shuk pakhi that has entered your body will be born as your son, and this Shuk Pakhi has attained immortality by hearing the  immortal story from my mouth”. Needless to say this Sukh Pakhi was born as Shri Sukhdev, the son of Vyas Dev and Batikadevi after a long pregnancy of 12 years. He left the family after brought fourth from the womb.  After the battle of kurukshetra, under the curse of Kalkidev, Abhimanyu’s son recited the nectar of ‘hari katha’ to the dying traveller Parikshit, for seven days on the banks of the Ganges which is the only recourse of Koliyuga’s family men and this is called ‘Shrimadbhagwat’, the essence of the scriptures. The cave in which Mahadev sat and spoke Immortal  story is the immortal shrine of today where mrityunjay Mahadev lives forever.                

In ancient times the Kashmir valley was a land of  monsters. The great Saint Kashyap performed austerities on Devi Mahamaya, destroyed all the demons with her blessings, cut the hard hill of Baramulla and brought water to the valley.  People from different places came and settled here to make the valley smooth and prosperous. The valley was named after Kashyap was Kashyapmar which became ultimately known as Kashmir.  The great Saint Kashyap surrendered the rule of Kashmir to Nagraj Takshak and return to Ayodhya.  After a long time, one day the great Saint Bhrigu came here with a God gifted stick and told Takshak about Amarnath cave and Ice Lingam “if one travels on the the fourth day of white side of moon in the month of Shravan with this stick in his hand and visit the Sudha Lingam of Amarnath on the day of Shravani full moon, one will attain immortality”. This Devdanda is the stick of Amarnath Yatra – representative of Hara Parvati. A large stick wrapped in a sheet of silver is called ‘Devdanda’. No one knows the age of the stick. According to many, it is from the time of Sri Ramachandra in the Treta yuga and according to many, more than thirteen hundred years ago from today, Acharya Shankar and his disciple Mandan Mishra went to Amarnath cave with this Stick. This cane is currently owned by the Dasanami Akhara in Srinagar. However the journey of Amarnath started from the time of the great Saint Bhrigu. After a while everyone forgot about Amarnath Yatra and the cave. Acharya Shankar resumed his journey to Amarnath. The journey was interrupted during the Muslim reign in Kashmir.  What happened next was that in the 18th century, Akram Butt Mallick, a nomadic Gurjar Muslim came one day to graze his sheep at Amarnath. Akram Butt’s house was in Batkot village of Pahelgaon tehsil. When one day one of his sheep did not return at the end of the day, Akram Butt came to Amarnath cave to find it and discovered the iceberg and talked about the cave and the Ice Lingam among the local peoples. From then on, Amarnath cave and Ice Lingam were publicized. From Akram Butt, the descendants of Akram Butt of the Gurjar community still worship the Amarnath cave and Ice Lingam. Then in 1819 pandit Hardas Tiku, resumed this journey with the money saved throughout his life.  After Hardas Tiku, the Kashmir Government funding for the trip.  Now a days on the fourth day of white side of moon in the month of Shravan, Dasanami religion monk from Srinagar, worshipped the Stick and left with procession and reached Pahelgaon on the ninth day via Pampur, Anantnag, Marton and Ice-mokam. After staying here for three days, the procession of ‘Chharidanda’  started journey on the 12th day and takes night halt on the way at Chandhanwadi, Sheshnag and Panchatarani.  Finally it reaches at Amarnath cave on the full moon day which is called ‘Guru Purnima’. After staying and worshipping Devdanda there, the priests returned after one month on the day after full moon which is called ‘Rakhi Purnima’ and came to Pahelgaon. There after bathing that God gifted stick in Leeder river and worshipping, it is kept in a big size closed lidded box and take it to Shrinagar by motor car. Within one year this box is not open. During the one year that close lidded box is being worshipped at Srinagar by the Dasanami religion monks. Next year on the fourth day of white side of moon in the month of shravan that box is again opened.            

In ancient times the Kashmir valley was a land of  monsters. The great Saint Kashyap performed austerities on Devi Mahamaya, destroyed all the demons with her blessings, cut the hard hill of Baramulla and brought water to the valley.  People from different places came and settled here to make the valley smooth and prosperous. The valley was named after Kashyap was Kashyapmar which became ultimately known as Kashmir.  The great Saint Kashyap surrendered the rule of Kashmir to Nagraj Takshak and return to Ayodhya.  After a long time, one day the great Saint Bhrigu came here with a God gifted stick and told Takshak about Amarnath cave and Ice Lingam “if one travels on the the fourth day of white side of moon in the month of Shravan with the stick in his hand and visit the Sudha Lingam of Amarnath on the day of Shravani full moon, one will attain immortality”. This Devdanda is the stick of Amarnath Yatra – representative of Hara Parvati. A large stick wrapped in a sheet of silver is called ‘Devdanda’. No one knows the age of the stick. According to many it is from the time of Sri Ramachandra in the treta yuga and according to many more than thirteen hundred years ago from today, Acharya Shankar and Mandan Mishra went to Amarnath cave with Stick. This cane is currently owned by the Dasanami Akhara in Srinagar. However the journey of Amarnath started from the time of the great Saint Bhrigu. After a while everyone forgot about Amarnath Yatra and the cave. Acharya Shankar resumed his journey to Amarnath. The journey was interrupted during the Muslim reign in Kashmir.  What happened next was that in the 18th century, Akram Butt Mallick, a nomadic Gurjar Muslim came oneday to graze his sheep at Amarnath. Akram Butt’s house was in Batkot village of Pahelgaon tehsil. When one day one of his sheep did not return at the end of the day Akram Butt came to Amarnath cave to find it and discovered the iceberg and talked about the cave and the ice fall among the local peoples. From then on, Amarnath cave and Ice Lingam were publicized. From Akram Butt, the descendants of Akram Butt of the Gurjar community still worship the Amarnath cave and Ice Lingam. Then in  1819 pandit Hardas Tiku, resumed this journey with the money saved throughout his life.  

After Hardas Tiku, the Kashmir Government funding for the trip.  Now a days on the fourth day of white side of moon in the month of Shravan, Dasanami religion monk from Srinagar, worshipped the Stick and left with procession and reached Pahelgaon on the ninth day via Pampur, Anantnag, Marton and Ice-mokam. After staying here for three days, the procession of ‘Chharidanda’  started journey on the 12th day and takes night halt on the way at Chandhanwadi, Sheshnag and Panchatarani.  Finally it reaches at Amarnath cave on the full moon day which is called ‘Guru Purnima’. After staying and worshipping Devdanda there, the priests returned after one month on the day after full moon which is called ‘Rakhi Purnima’ and came to Pahelgaon. There after bathing that God gifted stick in Leeder river and worshipping, it is kept in a big size closed lidded box and take it to Shrinagar by motor car. Within one year this box is not open. During the one year that close lidded box is being worshipped at Srinagar by the Dasanami religion monks. Next year on the fourth day of white side of moon in the month of shravan that box is again opened.       

Regarding Amarnath Ice lingam and description of Amarnath Yatra was referred in ‘Ain-e-akbari’ written by Abul Fazal during Akbar’s reign. In the year 1890, Swami Vivekanand while traveling throughout India by foot came here alone and made penance three days at Amarnath cave and got euthanasia blessings from Lord Amarnath. His colleague Swami Abhedananda came here in the month of August in 1922, while he was travelling Tibet and Kashmir. Standing in front of the Ice Lingam, thinking of ice Lingam, God gifted stick, priest and myth of this cave, my heart was thrilled. I tried to feel the old incidents and thought that by the blessings of superpower, we came here and see that cave and Ice Lingam. Thinking of that Shuk Pakhi, I kept my eyes on the upper tier of Sudha Lingam and found one pigeon, ‘Shuk Pakhi’  of the past. Sometimes it flies from left to right side but did not fly outside of the cave. In this cold region how the pigeon is getting food and survive, that is a miracle. After a while it seemed to me that this Shuk Pakhi turn to pigeon was an eternal Bird.                       

 When we had decided to come here, my father-in-law who is above 80 years of age, expressed his anxiousness for coming here in an inaccessible and dangerous way, but the blessings of God Shiva and mother Parvati, departed soul of my parents, myself and my wife came here and see the Ice Lingam with our open eyes.  Thinking about all  struggles faced by us in the past, I could not check my tears with joy and happy. Then we handed over the dry fruits which we took for offering to God to the priest who touched that packet with Ice Lingam and Devdanda and returned to us.  After staying about ten minutes in front of the Sudha Lingam, we turned to left side and saw two small sizes of Ice cube which is called images of Ganesh and mother Parvati. We bowed down to them. Thereafter we took some dry fruits from the packet which priest returned, as we were observing fasting from the dawn. On the coming way we did not take a cup of tea, cold drinks or any solid food except drinking water. Before descending down we once again saw the Ice Lingam, God blessed Stick and cave. In our life time we could not come here again.  Today’s Darshan will be the absolute path of life. Gradually we were descending the stairs with happy and joy and thought that in the year 1897 when Swamy Vivekananda came here in second time with sister Nivedita and told her “I have enjoyed it so much. I thought the Ice Lingam was Shiva himself. I never enjoyed any religious places so much”. It is true that whoever did not come here he could not feel the enjoyment of one’s feeling. After descending, it felt to us to have a cup of hot tea or coffee, but there was no such shop because that day was the last day and everyone closed their shops. Then we came to the shops where we kept our bags and purchased dry fruits for offering to god. We took our bags and purchased one CD for Shiva stotram and photo album for reminiscent. Now time was 11:30 o’clock in mid day and it will take 4 hours to reach Sonemarg.  On returning way both of us rode on the back of horse so that we could go speedily. At about 3:30 o’clock in the afternoon we reached Sonemarg and gladly paid the horse owner for his contracted amount.  In our hotel room we called for warm water and kept our feet with warm water bucket for half an hour. In the late afternoon we went to market for purchasing souvenir for my granddaughter and by phone we called my sons and grandfather for safely visiting Amarnath cave  and returned back.  At night we had sound sleep as because all anxieties were over.  Tomorrow morning we shall start for Srinagar for onward visit to Khir-Bhavani and Vaishnodevi.   

Bio :

Debi Prasad Tripathy was a State Bank officer who retired from service in the year 2011. Now he is engaged in writings. He has completed travelogue on Dwadash Jyotirlinga, Narayan Kshetra and biography of Acharya Shankar and Shirdi Saibaba.

দুর্নীতির আঁধারে সমাজ : একটি সমীক্ষা

দুর্নীতির আঁধারে সমাজ : একটি সমীক্ষা - বারিদবরণ গুপ্ত

আজকাল দুর্নীতি কথাটা আমাদের কাছে খুবই জনপ্রিয় হয়ে উঠেছে, অফিসে আদালতে বাসে ট্রামে ট্রেনে মাঠে-ঘাটে যত প্রকারের আলোচনা হয় তার মধ্যে অবশ্যই দুর্নীতির কথাটা উঠে আসবেই। সাধারণ ভাবে বলা যায় নিয়ম-নীতিহীন‌ কাজই হলো দুর্নীতি, এককথায় দুর্নীতি হলো এক ধরনের বিচ্যূত আচরণ, এই আচরণ সামাজিক ন্যায়-নীতি সততা মানবিকতকে লংঘন করে, সমাজবজ্ঞানীরা দুর্নীতিকে সামাজিক ব্যাধি বলে বর্ণনা করেছেন, এ বিষয়ে সকলেই সহমত পোষণ করেন যে ব্যক্তিগত স্বার্থের জন্য মানুষ দুর্নীতির শিকার হয়। বর্তমানে বিশ্বের প্রায় প্রতিটি সমাজ কম বেশি দুর্নীতিগ্রস্ত, তবে এশিয়া তথা তৃতীয় বিশ্বের দেশগুলোতে এই বিচ্যুত আচরণ লাগামছাড়া হয়ে উঠেছে।
 
 দুর্নীতিকে আমরা তিনটি স্তরে ফেলে বিশ্লেষণ করতে পারি, সাধারণত সমাজের ক্ষমতাসীন বা প্রভাবশালী ব্যক্তিদের দুর্নীতি, এ ধরনের দুর্নীতি সমাজের নামিদামি লোকেরা করে থাকেন, তারা অর্থ বা ক্ষমতার জোরে দুর্নীতি করার সাহস পায়, এই স্তরে সমাজের প্রভাবশালী রাজনৈতিক কর্তাব্যক্তিদের ফেলা যেতে পারি, দ্বিতীয় স্তরে সাধারণত সরকারি আমলা, কর্মচারী, যারা সরকারি ক্ষমতার সাহায্যে দুর্নীতিতে জড়িয়ে পড়েন, আর তৃতীয় স্তর হল সমাজের সাধারণ মানুষ বা বেসরকারী প্রতিষ্ঠানের কর্মচারীবৃন্দ ‌। এক কথায় গোটা সমাজ  কম বেশি দুর্নীতিগ্রস্ত ‌‌।
 
 এখন সবার মনে প্রশ্ন উঠতে পারে যে দুর্নীতিকে কেন রাখা যাচ্ছে না, কেন সমাজ দুর্নীতির আঁধারে ডুবে যাচ্ছে, তাহলে কি সমাজ থেকে ন্যায়-নীতি মূল্যবোধ বিলুপ্ত হয়ে গেছে? আসলে সমাজ হলো নিয়ন্ত্রণমূলক প্রতিষ্ঠান, সমাজের নিয়ন্ত্রক গুলো যেমন আইন বিচার ও শাস্তি ,তিরস্কার ,প্রতিরোধ , প্রতিবাদ ইত্যাদি আলগা হয়ে গেলে তখনই সমাজ দুর্নীতিগ্রস্ত হয়ে পড়ে। অনেকেই দুর্নীতিকে পুকুরের কচুরিপানা বাড়ার সঙ্গে তুলনা করেন, যদি সূচনাতেই না নির্মূল করা যায় তাহলে যেমন সে গোটা পুকুর ছেয়ে ফেলে, দুর্নীতি ও  ঠিক তাই,‌ প্রাথমিক পর্যায়ে না রুখতে পারলে মহামারীর মত গোটা সমাজকে খেয়ে ফেলে ‌।
 
 বর্তমানে বিশ্বসমাজ দুর্নীতিতে ছেয়ে গেছে, এই উপমহাদেশের প্রায় প্রতিটি দেশ দূর্নীতিতে একে অপরকে টেক্কা দিচ্ছে, বর্তমানে মানুষ রাতারাতি ধনী হতে চায়, একে অপরের থেকে আরও বেশি অর্থবান প্রতিপত্তিশালী হতে চায়, এছাড়াও বর্তমানে প্রচন্ড ভোগবাদী মানসিকতা দুর্নীতির অন্যতম কারণ বলে সমাজতাত্ত্বিক রা মনে করেন‌‌। বর্তমানে বিশ্বসমাজ সহজ পথে অল্প সময়ে অর্থ রোজগারের জন্য যে নোংরা খেলায় মেতে উঠেছে তার জন্যই দুর্নীতি হু হু করে বাড়ছে ‌‌।
 
 Tranperancy International নামক সংস্থা দুর্নীতি বিষয়ে সমীক্ষা করে, অতি সম্প্রতি তাদের সমীক্ষায় দেখা যাচ্ছে বিশ্বের প্রায় প্রতিটি দেশই কম বেশি দুর্নীতিগ্রস্ত, এদের রিপোর্ট অনুযায়ী তৃতীয় বিশ্বের দেশগুলোতে বর্তমানে দুর্নীতি আশঙ্কাজনক হারে বাড়ছে‌‌। টি আই এর রিপোর্ট অনুযায়ী এশিয়ার দেশগুলো দুর্নীতিতে একে অপরকে টেক্কা দিচ্ছে, বর্তমানে ভারত বিশ্বের দুর্নীতিগ্ৰস্থ দেশের মধ্যে ৭৮ তম স্থানে রয়েছে, একমাত্র ভুটান ছাড়া এশিয়ার সমস্ত দেশ গুলিই কম বেশি দুর্নীতিগ্রস্ত । অতি সম্প্রতি ভারতে সরকারি পর্যায়ে বেশ কিছু দুর্নীতির ঘটনা ঘটছে, তাতে সরকারি কর্মচারী থেকে সমাজের অনেক গণ্যমান্য ব্যক্তিরা যুক্ত হয়ে পড়ছেন, সরকারি চাকরি থেকে বিভিন্ন পর্যায়ে ঘুষ-স্বজনপ্রীতি ইত্যাদির ঘটনা ঘটছে, বারবার আদালতকে হস্তক্ষেপ করতে হচ্ছে, আর সি বি আই তদন্তের তো আর শেষ নেই।
 
 বর্তমানে আমাদের একমাত্র লক্ষ্য হওয়া উচিত দুর্নীতিমুক্ত সমাজ প্রতিষ্ঠা করা । এর জন্য প্রয়োজন সম্মিলিত শক্তির জাগরণ, দেশ ও সমাজকে দুর্নীতিমুক্ত করতে জনসচেতনতা বৃদ্ধি করতে হবে, এ বিষয়ে নতুন প্রজন্মকে কার্যকরী ভূমিকা পালন করতে হবে, সমাজ রাষ্ট্রকে আরো বেশি ইতিবাচক দৃষ্টিভঙ্গি গ্রহণ করতে হবে, সমাজের বিধিবদ্ধ এবং অবিধিবদ্ধ নিয়ন্ত্রণ ব্যবস্থা কে আরো বেশি শক্তিশালী করতে হবে, আমাদের ভুলে গেলে চলবে না যে সমাজ একটি নিয়ন্ত্রণ মূলক প্রতিষ্ঠান‌‌। এছাড়া সমাজ থেকে হারিয়ে যাওয়া ন্যায়- নীতি মূল্যবোধকে ফিরিয়ে আনতে হবে, তার জন্য মূল্যবোধ চর্চা বাড়াতে হবে, সর্বোপরি জনসচেতনতা বৃদ্ধি করে মানবিকতাকে ফিরিয়ে আনতে হবে, তবেই বর্তমান সমাজের যে সংকট অর্থাৎ দুর্নীতি, সমাজতাত্ত্বিকরা যাকে সমাজের অসুখ বলেছেন, তা থেকে আমরা বেরিয়ে আসতে পারবো!
 

Bio :

বারিদবরণ গুপ্ত

বাড়ি পূর্ব বর্ধমান জেলার মন্তেশ্বর ব্লকের সাহাপুর গ্রামে, একজন শিক্ষাবিদ, কবি, প্রাবন্ধিক সমাজ সংস্কৃতি বিষয়ক গবেষণামূলক প্রবন্ধ লেখালেখির সাথে যুক্ত, তাছাড়া লৌকিক সমাজ সাহিত্য বিষয়ক লেখালেখির সাথে দীর্ঘদিন যুক্ত আছেন,

হারিয়ে যাচ্ছে বাংলার আগমনী গান

হারিয়ে যাচ্ছে বাংলার আগমনী গান - তুষার ভট্টাচার্য

আকাশের নীলাম্বরী মেঘ ধোওয়া শরৎকাল এলেই শ্রুতিমধুর আগমনী গানের সুরে ভেসে যায় বাংলার বিস্তীর্ণ জনপদ, প্রান্তর l শারদীয়া দুর্গোৎসবের সঙ্গে অঙ্গাঙ্গিভাবে জড়িয়ে রয়েছে আগমনী গান l
লোকশ্রুতি রয়েছে যে  একদা রাজা সুরথ’ই  নাকি প্রথম দুর্গাপুজোর প্রচলন করেছিলেন l তারপরে বিভিন্ন রাজা, জমিদাররা এই পুজোর পৃষ্ঠেপোষক ছিলেন l বর্তমানকালে দুর্গাপুজো সর্বজনীন উৎসবে পরিণত হয়েছে l চিরায়ত আগমনী গানও হয়ে উঠেছে
সর্বজনীন l
বিগত কয়েকদশক ধরে দুর্গাপুজোর অবিচ্ছেদ্য অঙ্গ হয়ে উঠেছে শারদীয়া পুজোর গান l প্রতিবছরই পুজোর সময়ে, দুর্গাপুজো নিয়ে নতুন গানের বিভিন্ন ক্যাসেট, সিডি বের হয় l 
শরতের ঝকঝকে স্নিগ্ধ অরুণ আলোয় আকাশের নীল রঙে মিশে বহুদূর থেকে হয়তো বা মাইকে ভেসে আসে পুরোনো দিনের আগমনী গানের সুর l তখন মনটা মুহূর্তে হু -হু করে ওঠে প্রতিটি নস্টালজিক বাঙালির l কন্যাসমা উমা বা মা দুর্গার জন্য l
শরতের এই আগমনী গানের মধ্যে দিয়েই দেশমাতৃকার রূপের আবাহন করেছেন রবীন্দ্রনাথ l কবির কলমে অপরূপভাবে ফুটে উঠেছে –
 
” আজি বাংলাদেশের হৃদয় হতে কখন আপনি
তুমি এই অপরূপ রূপে বাহির হলে জননী 
ওগো মা, তোমায় দেখে দেখে আঁখি না ফিরে
তোমার দুয়ার আজি খুলে গেছে সোনার মন্দিরে ”
আবহমানকাল ধরে বাঙালির দুর্গাপুজো হচ্ছে মৃন্ময়ী মূর্তির মধ্যে দিয়ে দেবীর চিন্ময়ী হয়ে ওঠার আরাধনা, অর্থাৎ দেশমাতৃকার চিরন্তন পুজোর আরও একটি রূপ l যেখানে শারদ রাত্রির শিশির জলে ভেজা বাতাসে ভেসে আসে পবিত্রতার চন্দন সুবাস l
আপামর বাঙালির মানসরূপ থেকে দূর হয়ে যায় সমস্ত হিংসা, ক্লেদ, অন্ধকার l যখন বাংলার আগমনী গানে ভেসে ওঠে এই চিরায়ত সুর –
” শঙখে শঙখে মঙ্গল গাও জননী এসেছে দ্বারে
প্রণত বৎসলা তুমি পরম মঙ্গলা
পাদপদ্মে দেহস্থান সেবক বৎসলা ”
 
রবীন্দ্রনাথ লিখেছেন –
”এসো শারদলক্ষ্মী তোমার শুভ্র মেঘের রথে
এসো নির্মল নীলপদ্মে
এসো ধৌত  শ্যামল আলোক ঝলমল
বনগিরি পর্বতে ”
 
এই শরতেই দেশকাল, প্রকৃতি ও দুর্গা পুজো সবকিছু মিলেমিশে এমন এক আবহের সৃষ্টি হয় এই বাংলায় যার তুলনা পৃথিবীর আর কোথাও খুঁজে পাওয়া যায় না l এই অপরূপ শারদ প্রাতের উল্লেখ করে কবি লিখেছেন  –
 
”আমার রাত পোহালো শারদ প্রাতে
বাঁশি তোমায় দিয়ে যাব কাহার হাতে
তোমার বুকে বাজল ধ্বনি
বিদায় গাঁথা আগমনী ”
 
কাল থেকে কালান্তরে, বছর থেকে বছরে, বাঙালিরা তাঁদের উত্তরসূরীদের হাতে এই শারদ প্রাতের বাঁশির সুরই দিয়ে যাচ্ছে আবহমানকাল ধরে l
মা দুর্গা অর্থাৎ, দেশ মাতৃকার উদ্দেশেই হয়তো কবি লিখেছিলেন এই গান –
 
”তুমি নব নব রূপে এসো প্রাণে
এসো গন্ধে বরণে এসো গানে ”
 
কিংবা,
লক্ষ্মী যখন আসবে তখন কোথায় দিবিরে ঠাই
দেখবে চেয়ে আপন পানে পদ্মটি নাই, পদ্মটি নাই ”
 
রবীন্দ্রনাথ মা দুর্গাকে অভিহিত করেছেন
শারদ সুন্দরী হিসেবে l
যেমন,
” কনক কিরণ ঘন শোভন স্যন্দন  নামিছে শারদ সুন্দরী
দশ দিক অঙ্গনে দিগঙ্গ  নাদল
ধ্বনিল শূন্যভরি শঙ্খ সুমঙ্গল
চলোরে চলো তুলি তব মালতি মঞ্জুরী ”
 
শরৎ এলেই এখনও বাংলার হাটে, মাঠে, ঘাটে  মাইকে শুনতে পাওয়া যায় শচীন দেব বর্মনের সেই বিখ্যাত গান –
” তাক দুম তাক দুম
বাজে ভাঙা ঢোল
সব ভুলে যাই
ভুলি নাই
বাংলা মায়ের বোল
তাক দুম, তাক দুম ….”
 
বাংলা ভাষায় এইসব ছাড়াও রয়েছে আরও কত আগমনী গান l বাংলার লোক গানে, আধুনিক গানেও রয়েছে আগমনী গানের সুর l
প্রতি বছর দুর্গাপুজো এলেই আপামর বাঙালির হৃদয়ের তন্ত্রীতে গুনগুন করে বেজে ওঠে কত না গান l যেমন  –
”শোন গো নিকট
এসো গো সুদূর
ঘরে ঘরে বাজে
আজ আনন্দ সুর ”
কিংবা,
”এই উজ্জ্বলতার স্রোতে
এই মঙ্গল গানে গানে
এই ফুটে ওঠা বিশ্বাসে
তুমি ফিরে এসো বারবার ”
 
মহালয়ার শিউলি ঝরা ভোরে যখন ‘ বাজল তোমার আলোর বেণু ‘ বা ‘ অয়ি ভুবনমোহিনী ‘গান শোনা যায় তখন সত্যিই মনে হয় কন্যা উমা আসছেন বছরপরে বাঙালির ঘরে ঘরে মণ্ডপে, মণ্ডপে l
”অপরূপা সর্বশক্তি ময়ী জননী
তমো বিনাশিনী
আলোক প্রদায়িনী ”
এই শারদ সুর শুনে সমস্ত দুঃখ, দুর্দশার কথা ভুলে গিয়ে আলোর সন্ধানে ব্রতী হয় আপামর বাঙালি l ঈশ্বর পাটনির সেই চিরন্তন কথাই আজও বাঙালিরা মায়ের কাছে কামনা করে  –
‘আমার সন্তান যেন থাকে দুধে ভাতে ‘
 
বস্তুত, আবহমানকাল ধরে বাংলার শরৎকালের সঙ্গে আগমনী গান অঙ্গাঙ্গিভাবে জড়িয়ে গিয়েছে l
আগমনী গান ছাড়া দেবী দুর্গা অর্থাৎ দেশমাতৃকার আবাহন কোনওমতেই ভাবা যায় না l
 
কিন্তু আক্ষেপের বিষয় হল হাল আমলে বাংলার জনপ্রিয় আগমনী গানগুলি চটুল আধুনিক বাংলা গান এবং ফিল্মি হিন্দি গানের দাপটে হারিয়ে যাচ্ছে কালের স্রোতে l
 

Bio :

তুষার ভট্টাচার্য : নিবন্ধ লেখেন বিভিন্ন বাংলা সংবাদপত্রে ( আজকাল, দৈনিক স্টেটসম্যান , উত্তরের সারাদিন, সুখবর প্রভৃতি পত্রিকায় ) l
কবিতা লেখেন দেশ, কৃত্তিবাস, নবকল্লোল সহ বিভিণ্ন সাহিত্য পত্রিকায় l
দুটি কাব্যগ্রন্থ প্রকাশিত হয়েছে সিগনেট প্রেস ( আনন্দ পাবলিশার্স ,কলকাতা ) থেকে l
 
 

नवरात्रो में स्वास्थ्य- रवि कुमार शर्मा

Health in Navratri- Ravi Kumar Sharma

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणुओं के आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है जिस का धार्मिक,आध्यात्मिक, लौकिक और शारीरिक दृष्टि से बड़ा महत्व है।

नवरात्र पर्व हमेशा चैत्र और आश्विन मास में ही होते हैं इसका एक वैज्ञानिक कारण है । मौसम विज्ञान के अनुसार यह दोनों मास सर्दी और गर्मी की संधि पर पड़ने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। शीत ऋतु का आगमन अश्विन मास से आरंभ हो जाता है और. ग्रीष्म ऋतु का चैत्र मास से , यह एक संधि काल है इसलिए हमारे स्वास्थ्य पर इनका विशेष प्रभाव पड़ता है । शरीर में वात पित्त और कफ तीनों पर प्रभाव पड़ता है । यह कारण है इस संसार के अधिकांश रोगी इन दोनों मास में या तो अच्छे हो जाते हैं या फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं |

जैसे ही एक ऋतु खत्म होती है प्रकृति में एक हलचल प्रारंभ होने लगती है । पेड़ पौधे, वनस्पति, जगत, जल, आकाश और वायुमंडल सभी में परिवर्तन होने लगता है । जब ऋतु बदलती है तो नए अन्न को शरीर को देने से पहले हम शरीर को खाली कर लेते हैं जैसे एक बर्तन में नये प्रकार के भोजन से पहले बर्तन साफ कर लिया जाता है | जब हम उपवास करते हैं तो शरीर के पाचन तन्त्र को विश्राम मिलता है परंतु विश निष्कासान (toxins) की प्रक्रिया चलती रहती है जिसे शरीर में जमा सारा विष निकाल जाता है । अब जब हम फिर से अन्न ग्रहण करते हैं तो पाचन तन्त्र अधिक क्षमता से काम करता है । इसलिए शास्त्रों और आयुर्वेद में भी संधि काल के इन महीनों में शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए 9 दिन तब विशेष रूप से व्रत उपवास आदि का विधान किया है |
यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते करते हुए इन नौ दिनों में विधि पूर्वक व्रत उपवास किया जाए तो आने वाले समय के लिए शरीर में नई शक्ति का संचार हो जाता है । इस कारण आगे आने वाले ऋतु परिवर्तन मैं किसी भी प्रकार का रोग और व्याधि से काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है ।

उपवास के दौरान अन्न नहीं खाने के पीछे वैज्ञानिक कारण यह भी है कि हमारे शरीर के लिए कभी-कभी भूखा रहना भी फायदेमंद होता है। उपवास करने पर हम अनादि नहीं खाते हैं जिससे हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है । व्रत के दौरान हम बहुत नियम से संतुलित खाना खाते हैं जो कि हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छा रहता है |
व्रत में नियम के अनुसार खाने से कब्ज गैस इन डाइजेशन सिर दर्द बुखार आदि बीमारियों का असर कम हो जाता है। उपवास वजन घटाने का सबसे अच्छा प्रभावी तरीका है यह यह शरीर की संरचना को नियंत्रित करता है , शरीर के मेटाबोलिज्म प्रणाली को नियंत्रित करता है । इसलिए हम नवरात्रि में 9 दिन का व्रत उपवास करते हैं और शरीर को मजबूत बनाते हैं |

प्रायः देखा जाता है कि ज्योतिष के माध्यम से पता चलता है कि किस कारण से यह रोग हुआ है और उसका इलाज रत्न चिकित्सा या मंत्र चिकित्सा के माध्यम से किया जाता है। मंत्र भी सही मुहूर्त मे करने पर शीघ्रातिशीघ्र प्रभावशाली होते है। यही कारण है कि पुराने से पुराने असाध्य रोगो को भी नवरात्रो मे मंत्र चिकित्सा द्वारा ठीक कर पाना सम्भव होता है ।