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तैंतीस कोटि देवताओं का रहस्य

तैंतीस कोटि देवताओं का रहस्य - वेद वेदांत

विगत वर्षों से  देवतासम्बन्ध में अनेकों लेख प्राप्त हो रहे हैं। इनके विषय “सनातन धर्म में मात्र 33 देवता है” “33 करोड़ देवता नहीं हैं ” इत्यादि होते हैं। पचासों वर्ष पूर्व आर्य समाजी भी इस प्रकार का प्रचार कर चुके हैं।प्रचारमात्र नहीं अपितु इस भ्रम का मूल स्रोत आर्य समाजी पुस्तकें ही हैं। किन्तु वर्तमान में इसका प्रसारण अधिक होने के कारण,इस विषय में जितने विचार सामने आए हैं उनकी समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है।

देवताओं के विषय पर इनका पक्ष इस प्रकार होता है ” देवताओं की संख्या 33 कोटि बताई गई है ( करोड़) नहीं । जिस प्रकार एक ही शब्द को अलग अलग स्थान पर प्रयोग करने पर अर्थ भिन्न हो जाता है ।उसी प्रकार देवभाषा संस्कृत में कोटि शब्द के दो अर्थ होते हैं।कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता है  । लेकिन यहां कोटि का अर्थ प्रकार है, करोड़ नहीं ।

12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और दो अश्विनी कुमार को मिलाकर कुल 33 देवता होते हैं ।

12 आदित्य:- अंशुमान, अर्यमा,.इन्द्र, .त्वष्टा, धाता, पर्जन्य, .पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु।

8 वसु:- .अप, .ध्रुव, .सोम, .धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और  प्रभाष।

 11 रुद्र :- शम्भु, पिनाकी, गिरीश, .स्थाणु, भर्ग, .भव, .सदाशिव, .शिव, हर, शर्व और कपाली।

 2 अश्विनी कुमार:- नासत्य और दस्त्र

कोटि का द्विविध अर्थ तो हमें भी स्वीकार है किन्तु प्राप्त प्रकरण में कोटि का अर्थ प्रकार होना मान्य नहीं क्योंकि ऐसा मानने पर अनेकों विप्रतिपत्तियां उपस्थित हो जाती हैं।

प्रथम इनमें प्रकार शब्द से क्या अपेक्षित है? यदि कहो कि आदित्य , वसु, रुद्र, अश्विनी ही ,तो फिर यह तो 4 प्रकार हुए जिनमें 33 देवताओं का अन्तर्भाव है। यदि कहो कि नहीं “33 देवता ही प्रकार हैं” तो ऐसी स्थिति में आपको इन प्रकारों में कौन-कौन से अन्य देव हैं? का भी वर्णन करना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि प्रकारार्थ वाचक कोटि शब्द का 33 देवों के साथ कहां वर्णन है। दोनों ही पक्षों में आपकी ही हानि है।

विस्तृत रूप से वर्णन किया जाए तो इन 33 देवों का वर्णन भी वेद शाखाओं में समान नहीं है । उदाहरण :- शतपथ 11।7।1।9 में 8 वसु ,11 रुद्र,12 आदित्य, इन्द्र और प्रजापति मिलाकर 33 देव हैं। शतपथ 4।5।7।4 में इन्द्र और प्रजापति के स्थान पर द्यु और पृथ्वी देव हैं। ऐतरेय 1.10 और 2.37 में इन्द्र के स्थान पर वषट्कार देवता रूप में प्रयुक्त है। अत: 33 देवताओं का वर्णन करने वाली श्रुतियो से ही 33 से अधिक देवताओं का होना स्पष्ट हो जाता है।

यजुर्वेदीय काठ्क संहिता के 37 वें स्थानक  में “सप्त सप्त मरुतो (37.4) 7×7=49 मरूतों का वर्णन है। तैत्तरीय संहिता 1.4.11.1 में भी “त्रिꣳशत् त्रयश् च गणिनो रुजन्तो दिवꣳ रुद्राः ” 33 रुद्र ही वर्णित हैं। वहीं अनन्त रुद्र (तैत्तरीय 4.5.11) और अनन्त विश्वैदेव होने की बात तो प्रसिद्ध ही है। ऐसे में यह मत की “मात्र 33 देवता ही हैं” कहीं नहीं ठहरता। अब कुछ और उदाहरण देखते हैं.

ऋग्वेद संहिता 1.45.2, 8.39.9, 3.6.9 एवं अथर्व संहिता 20.13.4 में “अग्नि” 33 देवताओं से भिन्न वर्णित है।

शुक्ल यजुर्वेद 20.36 में इन्द्र अन्य 33 देवताओं से भिन्न वर्णित हैं।

शुक्ल यजुर्वेद 20.11 में सूर्य और बृहस्पति अन्य देवताओं से भिन्न वर्णित हैं।

ऐसे ही सोम,आप, मरूत के विषय में समझना चाहिए। तात्पर्य यह हुआ कि (1) इन्द्र (2) अग्नि (3) सूर्य (4) बृहस्पति (5) सोम (6) आप (7) मरुत (8) अश्विनौ यह देव अनेकों स्थल पर 33 देवताओं से भिन्न भी वर्णित हैं। अत: उन स्थलों पर 33 देव इनसे अन्य हैं,यह मानना ही पड़ता है।

ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण 2.18 में 66 देवताओं का वर्णन है:-

त्रयस्त्रिंशद्वै देवाः सोमपास्त्रयस्त्रिंशदसोमपा अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्याः प्रजापतिश्च वषट्कारश्चैते देवा सोमपा एकादश प्रयाजा एकादशानुयाजा एकादशोपयाजा एतेऽसोमपाः।।

त्रयस्त्रिंशद्वै(66) देवता हैं,जिनमें से 33 सोमपान करने वाले हैं एवं 33 असोमपायी (सोमपान न करने वाले हैं)। सोमपान करने वाले देवों का वर्णन पूर्व में किया जा चुका अब असोमपान करने वाले देवताओं का वर्णन करते हैं। यह देव हैं :- एकादश (11) अनुयाज, एकादश प्रयाज ,एकादश (उपयाज) जिनमें वायु, मित्रावरूण आदि आते हैं।

अथर्ववेद संहिता 11.7.2 में षट्सहस्त्र (6000), तीस और तैंतीस सभी देवताओं का वर्णन है। त्रयस्त्रिंशत्त्रिशताः षट्सहस्राः सर्वान्त्स देवांस्तपसा पिपर्ति (अथर्व० 11.7.2)।

इस प्रकार से मंत्र संहिताओं और ब्राह्मण भाग दोनों से यह तो सिद्ध हो गया कि 33 ही नहीं अनन्त देव हैं. किन्तु इन विरुद्ध कथनों का समन्वय कैसे किया जाए? इसका निराकरण बृहदारण्यक शाङ्कर भाष्य से होगा।

अनन्त देवता हैं” यह बृहदारण्यक 3.2.12 में कहा जा चुका है। प्रसंग यह है कि शाकल्य द्वारा याज्ञवल्क्य को प्रश्न किया जाता है कि कितने देव हैं? उत्तर में याज्ञवल्क्य द्वारा “तीन सहस्त्र, तीन सौ तीन ,तैंतीस, छः,दो, अर्ध्यार्ध(1.5) और एक।

33 देवताओं का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि:-

वसु कर्मफलं चाहः कर्मणः साधनं वसु।  यस्मात्तदेषु निहितं तस्माते वसवः स्मृताः ॥ (बृहदारण्यक 3.9.3 पर वार्तिक)

प्राणियों के कर्मफल का आश्रय होकर इस सम्पूर्ण जगत को बसाए हुए हैं और स्वयं भी बसते हैं इसलिए वह वसु हैं। अग्नि से लेकर नक्षत्र पर्यन्त देव वसु हैं। भाष्य वचन है “यस्माद् वास्यन्ति तस्माद् वसव इति।

पुरुषे ये दश प्राणा इन्द्रियाणि सहात्मना । मनसैकादशात्रैतानुदानित्याचचक्षिरे ॥ रोदयन्तो द्रवन्त्येते रुदन्ति च यतस्ततः ।रुद्रा इत्यभिधीयन्ते प्राणा एकादशोदिताः।।(3.9.4)

10 प्राण और ग्यारहवां मन यह एकादश रुद्र हैं। यह प्राण कर्मफलोपभोग का क्षय हो जाने पर मरणशील व्यक्ति के शरीर से उत्क्रमण करते हैं एवं संबंधियो को एवं स्वयं को भी रुलाते हैं। रोदन में निमित्त होने से यह रुद्र हैं।

आददाना यतो यन्ति मानां स्थितिकारणम् । मासाभिमानिनो देवा आदित्यास्तेन ते स्मृताः ॥ आयुर्वीर्यं स्मृति प्रज्ञां सौकुमार्यं वपुःश्रियम् । आददाना यतो यन्ति तेनादित्या अमी स्मृताः ॥(3.9.5)

बारह मास संवत्सर रूप काल के अवयव प्रसिद्ध हैं ,वे ही द्वादश आदित्य हैं। यह ही पुन: पुन: परिवर्तित होते हुए प्राणियों की आयु और कर्मफल का उपादान करते चलते हैं इस कारण “आददाना यन्ति” के अनुसार वे आदित्य हैं।

वीर्यं वज्रोऽशनिरिति स्तनयित्नुरिहोच्यते । पशुसाधनको यस्माद्यज्ञस्तस्मात्पशः स्मृतः ॥(3.9.6)

वीर्य अर्थात बल ही अशनि( इन्द्र) है। प्रजापति यज्ञ है ,यज्ञ पशुगण हैं। क्यों? पशु यज्ञ के साधन हैं,यज्ञ पशुरूप साधन के अधीन है इसलिए “पशु यज्ञ हैं”यह कहा जाता है।

इस प्रकार के 33 देवताओं का वर्णन होने से बृहदारण्यक का यह कथन कि ” स॒होवाचः महिमा॒न एवै॒षामेते॒, त्र॒यस्त्रिंशत्त्वे॒व॒देवा॒इ॒ति (3.9.2) यह सभी देव इन तैंतीस देवताओं की ही महिमा हैं” की संगति हो जाती है।

आगे चलकर इन 33 देवताओं को छः देवताओं (अग्नि,पृथ्वी,वायु, अन्तरिक्ष,आदित्य और द्यु) की ही विभूतियां बताया है। इन छः का तीन देवताओं में और इस प्रकार क्रमश: अन्तर्भाव बताया है। अत: सिद्धान्त यह हुआ कि “अनन्तानां देवानां निवित्संख्याविशिष्टेष्वन्तर्भावः , तेषामपि त्रयविंशदादिषूत्तरोत्तरेषु यावदेकस्मिनन् प्राणे । प्राणस्यैव चैकस्य सर्वोऽनन्तसङ्ख्यातो विस्तरः ” अनन्त देवताओं का संख्या विशेष में अन्तर्भाव है,संख्या विशेष का इन 33 देवों में अन्तर्भाव है और उन तैतीस देवों का उत्तरोत्तर देवों में (6,3,2) में अन्तर्भाव है। एक प्राण का ही यह सब अनन्त संख्या के रूप में विस्तार हुआ है।

इस प्रकार 171 देवताओं के नाम तो ऋग्वेद के सर्वानुक्रम में ही मिल जाते हैं। अथर्व, यजु, साम की अन्योन्य संहिताओं और ब्राह्मणों को मिलाकर देवताओं की संख्या कितनी पहुंचेगी कुछ कहा नहीं जा सकता। अत: मात्र 33 देवता ही हैं अन्य सब नहीं” यह भ्रामक प्रचार है।

क्या विद्वान मनुष्य ही देवता हैं:-

विद्वांसो हि देवा” के अनुसार कुछ व्यक्ति विद्वान व्यक्तियों को ही देवता कहने की भूल करते हैं। इनसे यह पूछना चाहिए कि ज्योतिष्टोम, दर्शपूर्णमास करने वाला विद्वान व्यक्ति किसके निमित्त हवि देगा?इस विद्वांसो हि देवा” ब्राह्मण वाक्य में “देवान देवी(यजु 6.7) का अर्थ स्पष्ट किया गया है। यहां पर उशिज: यह पद देव का विशेषण है। देवगण विद्वान होते हैं,इस कारण उन्हें मंत्र में “उशिजो: वह्नितमान्” कहा गया है। शतपथ में तो स्पष्ट ही कह दिया गया है कि “देवयोनिरन्यो मनुष्ययोनिरन्य:” (शतपथ 7.4.2.40) देव योनि अन्य है मनुष्य योनि अन्य।।

33 करोड़ पूरे गिनवाएं

शिष्ट वैदिक परम्पराप्राप्त व्यक्तियों को ऐसे बचकाने वादों में समय नहीं व्यर्थ करना चाहिए। किन्तु यदि कोई नास्तिक शिरोमणि यह प्रश्न पूछ भी ले तो सर्वप्रथम उसकी प्रमाणहीनता ही दिखाइए कि वेद का सहारा लेकर तुम 33 देवता सिद्ध करने चले थे ,वेद के प्रमाण से ही अनेकों देव सिद्ध हो जाने पर तुम क्यों प्रसंग परिवर्तित करते हो?यह स्पष्ट रूप से प्रतिभा की कमी का ही लक्षण है। इतने में ही वह नियमानुसार अन्यों की दृष्टि पराजित हो जाता है।

देवताओं की संख्या के विषय में नक्षत्राणि वै सर्वेषां देवानामायतनं (शतपथ 14.3.2.12) सभी नक्षत्र ही देवताओं के निवास स्थान हैं। द्यौर्वै सर्वेषां देवानामायतनं (शतपथ 14.3.2.8) व्योम ही देवताओं का निवास स्थान है” आदि वचन दिखा कर उसे रात को खुले आसमान में नक्षत्र तारे आदि गिनने को कहिए,33 करोड़ से एक भी कम न निकलेगा।

इति।

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